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कोरोना से बच गए तो, जीवन निहाल है

>> 17 सितंबर, 2020

                            सम-सामयिक कविता

यह कोरोना काल है, दुनिया में भूचाल है,
घर से बाहर ना निकलें, जी का जंजाल है।
पर किसने किसकी मानी है, घर में रहने की ठानी है,
जब फैल गया कोरोना तो, हर बस्ती में वीरानी है।
चारों ओर हाहाकार है, मरीजों की चीत्कार है,
दवा नहीं बनेगी, तब तक डॉक्टर भी लाचार हैं।
सूना सूना बाज़ार है, ऑनलाइन व्यापार है,
काम-धंधा कब करें, चिंतित हर परिवार है।
टूट रहे अरमान हैं, बिदक रहे मेहमान हैं,
लग जाये यदि रोग तो, मर कर भी अपमान है।
मंदिर में बंद भगवान हैं, भटक रहे जजमान हैं,
त्योहारों के मौसम में, ना राशन ना पकवान है।
फ़ेस मास्क जरूरी है, रखना दो गज की दूरी है,
कितने भी हों काम पड़े, घर पर रहना मजबूरी है।
जिंदगी बेहाल है, बहुत बुरा हाल है,
कोरोना से बच गए तो जीवन निहाल है।
ऊपर वाले से गुहार है, सुखी रहे संसार है,
हाथ जोड़ विनती करे, बजाज बारम्बार है।
- अशोक बजाज रायपुर

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स्वतन्त्रता दिवस 2020 की चित्रमय झांकी

>> 27 अगस्त, 2020

स्वतन्त्रता दिवस 2020 की चित्रमय झांकी 

कोरोना महामारी के चलते इस बार स्वतन्त्रता दिवस समारोह सादगी एवं सावधानी से मनाया गया. लॉकडाउन के कारण विद्यार्थियों की अनुपस्थिति में ध्वजारोहण हुआ.बहरहाल बिना रौनक के सभी जगह कार्यक्रम संपन्न हुये. 

नगर पंचायत मुख्यालय अभनपुर में स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर  
संबोधित करते हुये

स्वतन्त्रता दिवस समारोह में नगर पंचायत अभनपुर के कर्मचारियों को
स्वच्छता कीट वितरण करते हुये.

स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर नगर पंचायत कार्यालय अभनपुर में
सी सी टी व्ही का विधिवत शुभारंभ करते हुये.

सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर में 1990 से लगातार 60 वी बार
(दोनों राष्ट्रीय पर्वों को मिलाकर) ध्वजारोहण करने का सुअवसर मिला.

स्वतन्त्रता दिवस 2020 : सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर

स्वतन्त्रता दिवस 2020 : सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर,
कोरोना महामारी के चलते कुछ यूं हुआ संबोधन.

स्वतन्त्रता दिवस 2020 : सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर,
कोरोना महामारी के चलते कुछ यूं हुआ समारोह।

स्वतंत्रता दिवस 2020 : सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर बस्ती

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गणतंत्र दिवस 2020 की झलकियाँ

>> 27 जनवरी, 2020

                            गणतंत्र दिवस 2020 की झलकियाँ 
                                                 
सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर में 1990 से लगातार 59 वी बार (26 जनवरी + स्वतंत्रता दिवस) ध्वजारोहण करने का सुअवसर मिला.



सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर के गणतंत्र दिवस समारोह में विद्यार्थियों द्वारा हस्त लिखित पत्रिका का विमोचन करते हुए.

सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर में गणतंत्र दिवस समारोह

सरस्वती शिशु मंदिर अभनपुर में गणतंत्र दिवस समारोह

नगर पंचायत अभनपुर में गणतंत्र दिवस समारोह

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लोहड़ी पर्व की हार्दिक बधाई

>> 13 जनवरी, 2020

                          

आप सबको लोहड़ी पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !

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स्वामी विवेकानंद जयंती पर शत शत नमन

>> 12 जनवरी, 2020

"संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है असंभव से आगे निकल जाना"

                                             - स्वामी विवेकानंद 

स्वामी विवेकानंद जयंती पर शत शत नमन

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मानवता का धर्म नया है

>> 01 जनवरी, 2020


                                                       

हम कैलेण्डर में तिथि बदलने की सामान्य प्रक्रिया को नव वर्ष ना समझे. स्वाभाविक रूप से 31 दिसंबर के बाद एक जनवरी ही आएगा. वैसे तो प्रतिदिन सूरज की किरणें नया सन्देश लेकर आती है ठीक वैसे ही 1 जनवरी आया है.  जश्न तो आप बेशक रोज मनाये लेकिन 1 जनवरी को उसी रूप में लें जैसे अन्य दिन को आप लेते है. नया साल अलग अलग लोगों या समूहों के लिए अलग अलग समय में नए एहसास के साथ आता है तब वह झूमता है, नाचता है और खुशिया मनाता है. जैसे कोई सफल विद्यार्थी अगली कक्षा में प्रवेश लेता है तो उसे नयेपन का अनुभव होता है अथवा कोई विद्यार्थी स्कूल से कालेज के पायदान पर चढ़ता है तो उसे नए पन का एहसास होता है.  इसी प्रकार किसी युवक की जब नौकरी लग जाती है और जिस दिन वह ड्यूटी ज्वाईन करता है उसके नए कैरियर की शुरुवात होती है. यदि किसी नौकरीपेशा आदमी का प्रमोशन हो जाय अथवा कोई शादी के बाद नए वैवाहिक जीवन की शुरुवात करे तो ख़ुशी का एहसास होना लाजिमी है और होता भी है.
व्यापारियों के लिए नया साल दिवाली में आता है जब वे नए सिरे से खाता बही तैयार करते है, किसानों के लिए नया वर्ष नई फसल के साथ आता है. देश के अनेक प्रान्तों में अलग अलग नाम से यह त्यौहार मनाया जाता है जैसे पंजाब में बैसाखी और दक्षिण में पोंगल का त्यौहार नई फसल आने के उमंग में मनाया जाता है. लेकिन एक जनवरी को ऐसा कुछ नहीं होता जिसके कारण हम उसे नए साल का नाम दें. इसके ठीक विपरीत भारत में नया वर्ष चित्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाया जाता है, प्राकृतिक दृष्टि से यह औचित्यपूर्ण इसीलिये है क्योंकि उस समय नए मौसम यानी बसंत ऋतु का आगमन होता है. खेत खलियान रंगीन फूलों से सजे होते है. सरसों की पीली पीली फूलों एवं टेसुओं की केसरिया फूलों को देखकर मन आनंदित हो उठता है. यह हमें नयेपन का एहसास कराता है. वास्तव में हम सबके लिए नया वर्ष वही है. अतः कैलेण्डर में तिथि बदलने की सामान्य प्रक्रिया को हम केवल उसी रूप में लें जैसे अन्य दिन को लेते है. 
इस संबध में पूर्व में लिखी इस स्वरचित कविता को प्रासंगिक मानकर प्रस्तुत कर रहा हूँ.

कविता / मानवता का धर्म नया है

धूप वही है, रुप वही है,
सूरज का स्वरूप वही है;
केवल उसका आभाष नया है,
किरणों का एहसास नया है.

रीत वही है, मीत वही है,
जीवन का संगीत वही है;
केवल उसका राग नया है,
मित्रों का अनुराग नया है.

 नाव वही, पतवार वही है,
बहते जल की धार वही है;
केवल तट और किनारा नया है,
इस जीवन का सहारा नया है.

खेत वही है, खलिहान वही है,
मेहनतकश किसान वही है;
केवल उपजा धान नया है,
धरती का परिधान नया है. 

मन वही है, तन वही है,
मेरा प्यारा वतन वही है;
केवल अपना कर्म नया है,
मानवता का धर्म नया है.

                      - अशोक बजाज

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भारत जमीन का टुकड़ा नहीं चन्दन की भूमि है

>> 27 दिसंबर, 2019

भारत रत्न अटलबिहारी वाजपेयी की 95 वी जयंती पर विशेष आलेख

 भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,

जीता जागता राष्ट्रपुरुष है.

हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,

पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं.

पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं.

कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है.

यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,

यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है.

इसका कंकर-कंकर शंकर है,

इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है.

हम जिएंगे तो इसके लिए

मरेंगे तो इसके लिए.


                                     - श्री अटलबिहारी वाजपेयी


अपने जीवन का पल पल देश को समर्पित करने वाले विख्यात राजनीतिक संत, पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी के ये विचार देश की युवा पीढ़ी को सदैव प्रेरणा देते रहेंगें. 25 दिसंबर 2019 को उनकी 95 वी जयंती है. उनका जन्म मघ्य प्रदेश के ग्वालियर में एक साधारण  परिवार में 25 दिसंबर 1924 को इनका जन्म हुआ था तथा 16 अगस्त 2018 को उनका निधन हुआ. आज भले ही वे हमारे बीच नहीं है लेकिन उनकी लोकप्रियता देश और दुनिया की राजनीतिक क्षितिज पर ध्रुव तारे की तरह अटल है. वे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सर्वमान्य नेता रहें है. एक ऐसे उदार नेता जिनकी कथनी और करनी में कभी अंतर नहीं रहा. ह्रदय से अत्यंत ही भावुक लेकिन तेजस्वी नेता माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जो लच्छेदार भाषण के जरिये लाखों लोंगों को घंटो तक बाँधें रखने की क्षमता रखते थे. श्री  वाजपेयी के पास 40 वर्षों से अधिक का एक लम्बा संसदीय अनुभव रहा है. वे 1957 से सांसद रहे हैं. वे पांचवी, छठी और सातवीं लोकसभा तथा फिर दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं , तेरहवीं और चौदहवीं लोकसभा के लिए चुने गए और सन् 1962 तथा 1986 में राज्यसभा के सदस्य रहे. वे लखनऊ (उत्तरप्रदेश) से लगातार पांच बार लोकसभा सांसद चुने गए. वे ऐसे अकेले सांसद हैं जो अलग-अलग समय पर चार विभिन्न राज्यों - उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा दिल्ली से निर्वाचित हुए थे.

श्री अटल बिहारी वाजपेयी 16 से 31 मई 1996 और दूसरी बार 19 मार्च 1998 से 13 मई 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे. प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद वे ऐसे अकेले प्रधानमंत्री रहे हैं जिन्होंने लगातार तीन जनादेशों के जरिए भारत के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित किया. वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन जो देश के विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न पार्टियों का एक चुनाव-पूर्व गठबन्धन है और जिसे तेरहवीं लोकसभा के निर्वाचित सदस्यों का पूर्ण समर्थन और सहयोग हासिल के नेता चुने गए. श्री वाजपेयी भाजपा संसदीय पार्टी जो बारहवीं लोकसभा की तरह तेरहवीं लोकसभा में भी अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी के निर्वाचित नेता रहे हैं.


उन्होंने विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कॉलेज, ग्वालियर और डी.ए.वी. कॉलेज कानपुर (उत्तरप्रदेश) से शिक्षा प्राप्त की. श्री वाजपेयी ने एम.ए. (राजनीति विज्ञान) की डिग्री हासिल की तथा उन्होंने अनेक साहित्यिक, कलात्मक और वैज्ञानिक उपलब्धियां अर्जित की. उन्होंने राष्ट्रधर्म (हिन्दी मासिक), पांचजन्य (हिन्दी साप्ताहिक) और स्वदेश तथा वीर अर्जुन दैनिक समाचार-पत्रों का संपादन किया. उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं-- ''मेरी संसदीय यात्रा''(चार भागों में); ''मेरी इक्यावन कविताएं''; ''संकल्प काल''; ''शक्ति से शांति'' और ''संसद में चार दशक'' (तीन भागों में भाषण)1957-95; ''लोकसभा में अटलजी'' (भाषणों का एक संग्रह); ''मृत्यु या हत्या''; ''अमर बलिदान''; ''कैदी कविराज की कुंडलियां''(आपातकाल के दौरान जेल में लिखीं कविताओं का एक संग्रह); ''भारत की विदेश नीति के नये आयाम''(वर्ष 1977 से 1979 के दौरान विदेश मंत्री के रूप में दिए गए भाषणों का एक संग्रह); ''जनसंघ और मुसलमान''; ''संसद में तीन दशक''(हिन्दी) (संसद में दिए गए भाषण 1957-1992-तीन भाग); और ''अमर आग है'' (कविताओं का संग्रह),1994.

श्री वाजपेयी ने विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया है. वे सन् 1961 से राष्ट्रीय एकता परिषद् के सदस्य रहे हैं. वे कुछ अन्य संगठनों से भी सम्बध्द रहे हैं जैसे-(1) अध्यक्ष, ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एंड असिस्टेंट मास्टर्स एसोसिएशन (1965-70); (2) पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मारक समिति (1968-84); (3) दीनदयाल धाम, फराह, मथुरा (उत्तर प्रदेश); और (4) जन्मभूमि स्मारक समिति, (1969 से) .

पूर्ववर्ती जनसंघ के संस्थापक-सदस्य (1951), अध्यक्ष, भारतीय जनसंघ (1968-73), जनसंघ संसदीय दल के नेता (1955-77) तथा जनता पार्टी के संस्थापक-सदस्य (1977-80), श्री वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष (1980-86) और भाजपा संसदीय दल के नेता (1980-1984,1986 तथा 1993-1996) रहे.  वे ग्यारहवीं लोकसभा के पूरे कार्यकाल तक प्रतिपक्ष के नेता रहे. इससे पहले वे 24 मार्च 1977 से लेकर 28 जुलाई, 1979 तक मोरारजी देसाई सरकार में भारत के विदेश मंत्री रहे.

पंडित जवाहरलाल नेहरु की शैली के राजनेता के रुप में देश और विदेश में अत्यंत सम्मानित श्री वाजपेयी के प्रधानमंत्री के रुप में 1998-99 के कार्यकाल को ''साहस और दृढ़-विश्वास का एक वर्ष'' के रुप में बताया गया है. इसी अवधि के दौरान भारत ने मई 1998 में पोखरण में कई सफल परमाणु परीक्षण करके चुनिन्दा राष्ट्रों के समूह में स्थान हासिल किया. फरवरी 1999 में पाकिस्तान की बस यात्रा का उपमहाद्वीप की बाकी समस्याओं के समाधान हेतु बातचीत के एक नये युग की शुरुआत करने के लिए व्यापक स्वागत हुआ. भारत की निष्ठा और ईमानदारी ने विश्व समुदाय पर गहरा प्रभाव डाला. बाद में जब मित्रता के इस प्रयास को कारगिल में विश्वासघात में बदल दिया गया, तो भारत भूमि से दुश्मनों को वापिस खदेड़ने में स्थिति को सफलतापूर्वक सम्भालने के लिए भी श्री वाजपेयी की सराहना हुई. श्री वाजपेयी के 1998-99 के कार्यकाल के दौरान ही वैश्विक मन्दी के बाबजूद भारत ने 5.8 प्रतिशत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृध्दि दर हासिल की जो पिछले वर्ष से अधिक थी. इसी अवधि के दौरान उच्च कृषि उत्पादन और विदेशी मुद्रा भण्डार जनता की जरुरतों के अनुकूल अग्रगामी अर्थव्यवस्था की सूचक थी . ''हमें तेजी से विकास करना होगा। हमारे पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है  '' वाजपेयी जी का नारा रहा है जिसमें विशेषकर गरीब ग्रामीण लोगों को आर्थिक रुप से मजबूत बनाने पर बल दिया गया है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, सुदृढ़ आधारभूत-ढांचा तैयार करने और मानव विकास कार्यक्रमों को पुनर्जीवित करने हेतु उनकी सरकार द्वारा लिए गये साहसिक निर्णय ने भारत को 21वीं सदी में एक आर्थिक शक्ति बनाने के लिए अगली शताब्दी की चुनौतियों से निपटने हेतु एक मजबूत और आत्म-निर्भर राष्ट्र बनाने के प्रति उनकी सरकार की प्रतिबध्दता को प्रदर्शित किया. 52वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले की प्राचीर से बोलते हुए उन्होंने कहा था, ''मेरे पास भारत का एक सपना है: एक ऐसा भारत जो भूखमरी और भय से मुक्त हो, एक ऐसा भारत जो निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो. ''

श्री वाजपेयी ने संसद की कई महत्वपूर्ण समितियों में कार्य किया है. वे सरकारी आश्वासन समिति के अध्यक्ष (1966-67); लोक लेखा समिति के अध्यक्ष (1967-70); सामान्य प्रयोजन समिति के सदस्य (1986); सदन समिति के सदस्य और कार्य-संचालन परामर्शदायी समिति, राज्य सभा के सदस्य (1988-90); याचिका समिति, राज्य सभा के अध्यक्ष (1990-91); लोक लेखा समिति के अध्यक्ष (1991-93); विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष (1993-96) रहे. श्री वाजपेयी ने स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा लिया और वे 1942 में जेल गये. उन्हें 1975-77 में आपातकाल के दौरान बन्दी बनाया गया था .

व्यापक यात्रा कर चुके श्री वाजपेयी अंतर्राष्ट्रीय मामलों, अनुसूचित जातियों के उत्थान, महिलाओं और बच्चों के कल्याण में गहरी रुचि लेते रहे हैं. उनकी कुछ विदेश यात्राओं में ये शामिल हैं- संसदीय सद्भावना मिशन के सदस्य के रुप में पूर्वी अफ्रीका की यात्रा, 1965; आस्ट्रेलिया के लिए संसदीय प्रतिनिधिमंडल 1967; यूरोपियन पार्लियामेंट 1983; कनाडा 1987; कनाडा में हुई राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की बैठकों में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल 1966 और 1984; जाम्बिया, 1980; इस्ले आफ मैन 1984; अंतर-संसदीय संघ सम्मेलन जापान में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल 1974; श्रीलंका, 1975; स्वीट्जरलैंड 1984; संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1988, 1990, 1991, 1992, 1993 और 1994; मानवाधिकार आयोग सम्मेलन जेनेवा में भाग लेने हेतु भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता 1993.

श्री वाजपेयी को उनकी राष्ट्र की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए वर्ष 1992 में पद्म विभूषण दिया गया तथा 2015 में भारत रत्न सम्मान से विभूषित किया गया. उन्हें 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार तथा सर्वोत्तम सांसद के लिए भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पंत पुरस्कार भी प्रदान किया गया. इससे पहले वर्ष 1993 में उन्हें कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा फिलॉस्फी की मानद डाक्टरेट उपाधि प्रदान की गई.

 वे निम्नलिखित पदों पर आसीन रहे :---

•1951 -           भारतीय जनसंघ के संस्थापक-सदस्य (B.J.S)
•1957 -           दूसरी लोकसभा के लिए निर्वाचित
•1957-77 -     भारतीय जनसंघ संसदीय दल के नेता
•1962 -          राज्यसभा के सदस्य
•1966-67 -     सरकारी आश्वासन समिति के अध्यक्ष
•1967 -          चौथी लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (दूसरी बार)
•1967-70 -     लोक लेखा समिति के अध्यक्ष
•1968-73 -     भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष
•1971 -          पांचवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (तीसरी बार)
•1977 -          छठी लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (चौथी बार)
•1977-79 -    केन्द्रीय विदेश मंत्री
•1977-80 -    जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य
•1980 -         सातवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (पांचवीं बार)
•1980-86 -    भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष
•1980-84, 1986 और 1993-96 -  भाजपा संसदीय दल के नेता
•1986 -          राज्यसभा के सदस्य; सामान्य प्रयोजन समिति के सदस्य
•1988-90 -    आवास समिति के सदस्य; कार्य-संचालन सलाहकार समिति के सदस्य
•1990-91 -    याचिका समिति के अध्यक्ष
•1991 -         दसवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (छठी बार)
•1991-93 -    लोकलेखा समिति के अध्यक्ष
•1993-96 -    विदेश मामलों सम्बन्धी समिति के अध्यक्ष; लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता
•1996 -         ग्यारहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (सातवीं बार)
•16  मई 1996 - 31 मई 1996 तक -  भारत के प्रधानमंत्री
•1996-97 -        प्रतिपक्ष के नेता, लोकसभा
•1997-98 -        अध्यक्ष, विदेश मामलों सम्बन्धी समिति
•1998 -             बारहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (आठवीं बार)
•1998-99 -        भारत के प्रधानमंत्री;
•1999 -             तेरहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (नौवीं बार)
•13 अक्तूबर 1999 से 13 मई 2004 तक- भारत के प्रधानमंत्री
•2004 -          चौदहवीं लोकसभा के लिए पुन: निर्वाचित (दसवीं बार)


उन्होंने सन 2000 में अपने अटल इरादे से छत्तीसगढ़, झारखंड एवं उत्तराखंड तीन राज्यों की स्थापना की. इन 19 वर्षों में इन नवोदित राज्यों ने तेजी से विकास किया. विशेष छत्तीसगढ़ ने अनेक मामलों में मॉडल स्टेट के रूप अपनी पहचान बनाई. ऐसे महान राष्ट्र सपूत, जनसेवक आज भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका कतृत्व आज़ाद भारत के विकास में मील का पत्थर साबित हो रहा है.   


 - अशोक बजाज 

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