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रेडियो प्रसारण दिवस

>> 23 जुलाई, 2010

भारत में रेडियो के बढ़ते कदम

आज प्रसारण दिवस है। देश के लिए नई उपलब्धियों का तथा रेडियों श्रोताओं के लिए यह खुशी का दिन है। 83 वर्ष पूर्व 23 जुलाई 1927 को भारत में रेडियो का पहला प्रसारण बम्बई से हुआ। दुनिया में रेडियो प्रसारण का इतिहास काफी पुराना नहीं है। सन 1900 में मारकोनी ने इंग्लैण्ड से अमरीका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियो संदेश की शुरूआत की। इसके बाद कनाडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेंसडेन ने 24 दिसम्बर 1906 को रेडियो प्रसारण की शुरूआत की। उन्होंने जब वायलिन बजाया तो अटलांटिक महासागर में विचरण कर रहे जहाजों के रेडियो आपरेटरों ने अपने-अपने रेडियो सेट में सुना। कल्पना कीजिये कितना सुखद क्षण रहा होगा, लोग झूम उठे होंगे। संचार युग में प्रवेश का यह प्रथम पड़ाव था। उसके बाद पिछले 104 वर्षों का इतिहास बड़ा रोचक है। विज्ञान ने खूब प्रगति की। संचार के क्षेत्र में दुनिया अब बहुत आगे बढ़ चुकी है।


भारत में 23 जुलाई 1927 को प्रायोगिक तौर पर प्रसारण शुरू किया गयां उस समय की भारत सरकार एवं इंडियन ब्राडकास्टिंग लिमिटेड के बीच समझौते के तहत रेडियो प्रसारण प्रारंभ हुआ। यह कंपनी 1930में निस्तारण में चली गई तो इसका राष्ट्रीयकरण कर  ”इंडियन ब्राड कास्टिंग कारपोरेशन रखा गया। आजादी के बाद 1956-57 में इसका नाम आल  इंडिया रेडियो या आकाशवाणी रखा गया। जहां तक आकाशवाणी का सवाल है,आजादी के समय 1947 में इसका केवल 6 केन्द्रों एवं 18 ट्रांसमीटरों का नेटवर्क  था तथा उसकी पहुंच केवल 11 प्रतिशत लोगों तक थी। आज आकाशवाणी के 231 केन्द्र तथा 373 ट्रासमीटर है तथा इसकी पहुंच 99 प्रतिशत लोगों तक है। भारत जैसे बहु संस्कृति,बहुभाषी देश में आकाशवाणी से 24भाषाओं में इसकी घरेलू सेवा का  प्रसारण होता है। आकाशवाणी मिडियम वेव, शार्ट वेव एवं एफ.एम के माध्यम से प्रसारण सेवा प्रदान करती है।


तब और अब में आज कितना फर्क हो गया है। एक समय था जब रेडियो ही संचार का प्रमुख साधन था लेकिन आज जमाना बदल गया है। धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक बैठा व्यक्ति सतत् एक दूसरे के संपर्क में रहता है। दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी घटना हो पलभर में सभी जगह प्रसारित हो जाती है। तेज गति से चल रहे इस कॉलखण्ड में रेडियो की बात बड़ी असहज लगती होगी लेकिन यह सच है कि किसी जमाने में रेडियो की अपनी अलग ही शान थी। रेडियो रखना, रेडियो सुनना और रेडियो के कार्यक्रमों में भाग लेना गौरव की बात होती थी। टेलीविजन के आने के बाद रेडियो श्रोताओं में कमी आई है लेकिन एफ.एम के आने के बाद अब पुनः रेडियो के दिन लौट रहे हैं।


आजादी के बाद रेडियो का इतिहास सरकारी ही रहा है। भारत में रेडियो सरकारी नियंत्रण में ही रहा है। आम आदमी को रेडियो चलाने की अनुमति हेतु अनेक क्षेत्रों से दबाव आया। सन् 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं है। सन् २००२ में एन.डी.ए.सरकार ने शिक्षण संस्थानों को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी। उसके बाद 2006 में शासन ने स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन चलाने की अनुमति दी। परंतु इन रेडियो स्टेशनों से समाचार या सम-सामयिक विषयों पर चर्चा के प्रसारण पर पाबंदी है। फिर भी यह रेडियो जगत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है.


बहरहाल आकाशवाणी नें 23जुलाई 1927 से अब तक 83  वर्ष कि यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की है तथा तमाम अवरोधों के बावजूद वह पूरी गति के साथ आगे बढ़ रही है आकाशवाणी परिवार के साथ साथ सभी श्रोताओं को प्रसारण दिवस की हार्दिक बधाई  

5 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 23 जुलाई 2010 को 6:20 am  

रेड़ियो 83 साल का हो गया। टीवी के आने से इसकी पूछ परख कम हो गयी थी। लेकिन एफ़ एम और मोबाईल में आने से अब फ़िर रेड़ियो के दिन वापस आ गए। लोगों में रेड़ियो के प्रति फ़िर से एक बार जागरुकता बढी है। एक जमाने में मनोरंजन एवं सुचनाओं का प्रमुख साधन था।

चौपाल में बजता था"काबर रिसागे दमांद बाबु दुलरु", बटकी मा बासी अऊ चुटकी मा नून। बिनाका गीत माला इत्यादि।

बहुत अच्छी पोस्ट रेड़ियो का स्मरण कराती हुई।

आभार

उठा पटक 23 जुलाई 2010 को 7:12 am  

बहुत बढिया पोस्ट है भाई साहब!

समवेत स्वर/Samvet Swar 23 जुलाई 2010 को 9:26 pm  

बहुत सुंदर आलेख। लोगों तक यह जानकारी पहुंचाने के लिए चौपाल को बधाई।

पहले तो रेडियो के लिए लोग चौपाल पर इकट्ठे हुआ करते थे। रेडियो के जन्म दिन पर सभी श्रोताओं को आकाशवाणी कोलकाता की एफ.एम. आर.जे. नीलम शर्मा की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

जी हां, आजकल आर. जे. शब्द का चलन बढ़ गया है। रेडियो को इसी तरह चाहते रहें। अगले महीने 26 अगस्त (1927) को हमारे आकाशवाणी कोलाकाता का जन्म दिन है।

बाकी़ शहरों का तो मुझे अद़ाज़ा नहीं है, लेकिन कोलाकाता वासी दीवानगी की हद तक इसे चाहते हैं।

व्यक्तिगत रूप से मैं कोलकाता में रहते हुए ऑल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस(दिल्ली) को बहुत मिस करती हूं क्योंकि यहां साफ़ सुनाई नहीं देता। अनांउसर इकबाल बारसी,शमीम कुरैशी,ए. ज़ब्बार, ताहिरा नियाज़ी, मरियम बाज़ी को मिस करती हूँ। आज याद आता है 1990 का वह दिन जब मैं खुद उर्दू सर्विस के अनांउसरों से मिलने आकाशवाणी दिल्ली गई थी। और आज श्रोता हमसे लाईव प्रोग्राम्स में फोन पर बात करके निहाल हो जाते हैं।

रेडियो सुनने के शौक और लगाव ने मुझे आर.जे. के तौर पर अपने साथ जोड़ लिया।

- नीलम शर्मा 'अंशु'

सूर्यकान्त गुप्ता 23 जुलाई 2010 को 10:59 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
सूर्यकान्त गुप्ता 23 जुलाई 2010 को 11:00 pm  

कहते हैं कि मनुष्य जब अपना पूरा जीवन जी लेता है, मतलब सभी दांत टूट गये होते हैं लेकिन शतक पार करने की अवस्था मे होता है तो फिर दांत उगने लगते हैं। अर्थात पुन: शिशु अवस्था को प्राप्त करने लगता है। ठीक उसी तरह आज रडियो के 83 साल के होने पर यह बात लागू होती दिखाई पड़ती है । हम भी वह दिन नही भूलते जब रात 11-12 बजे तक आल इंडिया रेडियो की उर्दू सर्विस मे पुरानी गीतों का लुत्फ़ उठाया करते थे। इतिहास के बारे मे जानकारी संजो के नही रख पाये थे सो आज आपकी इस बेहतरीन पोस्ट के माध्यम से जान पाये। अच्छी प्रस्तुति। ……आभार॥

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