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चुनाव आयोग और ई. व्ही.एम. की विश्वसनीयता

>> 06 अगस्त, 2010


भारत में निर्वाचन आयोग की हीरक जयंती पर रायपुर के टाउन हाल में एक प्रदर्शनी लगी हैं । प्रदर्शनी में चुनाव आयोग की गतिविधियों को दर्शाने वाले विहंगम चित्र लगे हैं । चित्रो में दिखाया गया है कि मतदान दल को मतदान कराने के लिए दुर्गम रास्तों पहाड़यिों व बर्फीले स्थानो पर जाने के लिए किन किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है । देश में आज भी ऐसे स्थान है जहां पैदल जाना मुश्किल है लेकिन मतदान दल उंट या हाथी जैसे साधन का उपयोग करते है। गुजरात में एक स्थान हैं जहां केवल एक ही मतदाता है,उसी एक मतदाता के लिए मतदान दल को मतदान के एक दिन पूर्व से डयूटी करनी पड़ती हैं ।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक  देश हैं। विभिन्न शासन प्रणालियो में लोकतंत्र को सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली माना जाता है । लोकतांत्रिक व्यवस्था में 18 वर्ष या उससे अधिक के हर व्यक्ति को गुप्त मतदान के माध्यम से अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार हैं । इस व्यवस्था में प्रत्येक मतदाता को केवल एक व्होट देने का अधिकार है । चाहे वह व्यक्ति गरीब से गरीब हो या चाहे देश का राष्ट्रपति हो, सबको केवल एक व्होट का अधिकार हैं। इस मामले में आम मतदाता और सर्वाधिकार सम्पन्न राष्ट्रपति का अधिकार समान हैं।

मतपेटी
देश में पहले राजतांत्रिक व्यवस्था थी। भारत अनेक राजवाड़ो में बंटा था। पूरा शासन तंत्र राजाओं - महाराजाओं एवं सामंतो के इशारे पर चलता था । यदि राजा नही रहा तो शासन की बागडोर उसके उत्तराधिकारी के हांथ में आ जाती थी । इसलिए कहा जाता हैं कि राजा पहले रानी के पेट से निकलता था अब पेटी से निकलता है।पेटी से आशय मतपेटी से है। मतदान के लिए अब इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ई.व्ही.एम.) का उपयोग होने लगा है। बटन दबाओं राजा निकल आता है। राजा चुनना अब जितना आसान हो गया है उतना ही इससे रिस्क बढ गया है। लोग पिछले कुछ वर्षो से ई.व्ही .एम. की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं । संचार क्रांति के इस युग में इलेट्रानिक उपकरणो से छेडछाड़ करके आसानी से परिणाम को बदला जा सकता है। ई.व्ही .एम में वाई-फाई का इस्तेमाल होता है, यदि बैटरी बंद भी हो जाये तो प्रोग्राम को परिवर्तित किया जा सकता हैं ।

इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ई.व्ही.एम.)
विदवानो एंव सॉफ्टवेयर इंजीनियरों नें समय समय पर विभिन्न इलेक्टानिक वोटिंग मशीनो के मॉडलो का प्रयोग करके यह साबित कर दिया है कि इन मशीनो को आसानी से हैक किया जा सकता है केवल बीप की आवाज से ही यह स्पष्ट नही हो सकता कि व्होट दिया जा चुका है।यदि चुनाव अधिकारी निष्पक्ष नही हुआ तो वह नाम व चिन्ह लोड करते समय भी गड़बडी़ कर सकता है । हैकर्स इस बात को प्रमाणित कर चुके है कि मशीन की प्रोग्रामींग को गलत तरीके से सेटिंग करके अन्य उम्मीदवारों के मत को किसी एक खास उम्मीदवार के खाते डाला जा सकता है। पहले पहल तो ई.व्ही.एम. का उपयोग ट्रायल के तौर पर सीमित स्थानो में किया गया था इसलिए ज्यादा हो-हल्ला नही मचा लेकिन अब तो व्यापक रूप से इसका इस्तेमाल होने लगा है। इंजीनियरो की सहायता से भविष्य में इन दोषो को दूर करने का उपाय करना होगा। चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता को बरकरार रखने के लिए इसका पूरी तरह निष्पक्ष व पारदर्शी होनी आवश्यक है अन्यथा जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ जायेगा।


प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए जनप्रतिनिधि और अधिकारी



प्रदर्शनी में अटल जी के चित्र के साथ एक पोस्टर
                                                                           
'मतदान ज़रूर करें' विभिन्न पार्टियों के चुनाव चिन्हों से
 मतदान करने का संदेश देते युवक 

       

5 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 6 अगस्त 2010 को 6:38 am  

चोरी करने वाले तोड़ हर चीज का ढूंढ लेते हैं।
बीच में मैने एक लेख पढा था कहीं कि ईवीएम भी हैक हो सकता है।
इसे फ़ुलप्रुफ़ बनाने की आवश्यक्ता है,ताकि प्रजातंत्र की रक्षा हो सके,लोग अपना मतदान कर सकें

शुभकामनाएं

anup 6 अगस्त 2010 को 11:24 am  

यह लेख नईदिल्ली से प्रकाशित दैनिक वीर अर्जुन के दिनांक ५-८-२०१० के अंक मे भी पढ़ा जा सकता है.धन्यवाद

'उदय' 6 अगस्त 2010 को 5:17 pm  

... सार्थक पोस्ट !!!

अशोक बजाज 6 अगस्त 2010 को 5:44 pm  

''अगस्त यानि क्रांतिकारी महीना '' शीर्षक से एक लेख नईदिल्ली से प्रकाशित दैनिक वीर अर्जुन के दिनांक ५-८-२०१० के अंक मे पढ़े .. धन्यवाद

JanMit 8 अगस्त 2010 को 9:49 pm  

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में वोट देने के बाद क्या आप दावे से कह सकते हैं कि आपका वोट उसी पार्टी के खाते में गया जिसे आपने वोट दिया था?
कागजी मतपत्र पर तो आप अपने हाथ से अपनी आँखों के सामने मतपत्र पर सील लगाते हैं, जबकि EVM में क्या सिर्फ़ पंजे या कमल पर बटन दबाने और "पीं" की आवाज़ से ही आपने कैसे मान लिया कि आपका वोट दिया जा चुका है? जबकि हैकर्स इस बात को सिद्ध कर चुके हैं कि मशीन को इस प्रकार प्रोग्राम किया जा सकता है, कि "हर तीसरा या चौथा वोट" "किसी एक खास पार्टी" के खाते में ही जाये, ताकि कोई गड़बड़ी का आरोप भी न लगा सके।
अमेरिका, जर्मनी, हॉलैण्ड जैसे तकनीकी रुप से समृद्ध और विकसित देश इन मशीनों को चुनाव सिस्टम से बाहर क्यों कर चुके हैं?
अतः अब समय आ गया है कि इन मशीनों के उपयोग पर पुनर्विचार किया जाये |हमसबों को भी अब इस EVM मशीन का विरोध करना चाहिए |

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