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भारत की विश्व को देन

>> 13 अगस्त, 2010

भारत की विश्व को देन


 भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा। भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी। विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं। उसमें तो शायद हमको उनसे ही उल्टे कुछ सीखना पड़े। अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग, अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है। इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं।00304

                                              -  पं. दीनदयाल उपाध्याय

5 टिप्पणियाँ:

कडुवासच 13 अगस्त 2010 को 11:08 pm  

... प्रसंशनीय पोस्ट !!!

ब्लॉ.ललित शर्मा 13 अगस्त 2010 को 11:30 pm  

दीनदयाल उपाध्याय जी के कथन में भारत की आत्मा की आवाज प्रवाहित हो रही है। बिना सांस्कृतिक उत्थान के विकास संभव नहीं है।

अच्छी पोस्ट
आभार

ब्लॉ.ललित शर्मा 14 अगस्त 2010 को 7:04 am  

नागपंचमी की बधाई
सार्थक लेखन के लिए शुभकामनाएं-हिन्दी सेवा करते रहें।


नौजवानों की शहादत-पिज्जा बर्गर-बेरोजगारी-भ्रष्टाचार और आजादी की वर्षगाँठ

अजित गुप्ता का कोना 14 अगस्त 2010 को 10:37 am  

हम आज भारतीय संस्‍कृति की सीमाओं का विस्‍तार कर सकें तो श्रेष्‍ठ होगा तभी दीनदयाल जी के सपनों की दुनिया को साकार कर सकेंगे।

शिवम् मिश्रा 14 अगस्त 2010 को 10:42 am  

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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