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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही अंतिम विकल्प

>> 14 अगस्त, 2010

15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष
ज हम आजादी की 63 वी वर्षगांठ मना रहे हैं। किसी भी देश के विकास के लिए 63 वर्ष कोई कम नहीं है। वर्षों की गुलामी के बाद 15 अगस्त 1947 को आजाद मातृभूमि पर जब सूरज की पहली किरण पड़ी होगी तो वह दृश्य कितना मनमोहक रहा होगा। चारों तरफ ढोल-नगाडे़ बज रहे होंगे, युवकों की टोलियां मस्तानी नृत्य कर रही होगी। महिलाएं गा-गा कर जश्न मना रही होगी। किसान खेत जाना भूलकर मस्ती में डूब गये होंगे। साहित्यकारों एवं कवियों की लेखनी बंद हो गई होगी। नई सूरज की लालिमा के साथ चिड़ियों का झुंड कलरव करते हुये आजादी के तराने गा रहे होंगे।
गंगा, यमुना, कावेरी, गोदावरी, चंबल व महानदी जैसी असंख्य नदियों के जल की लहरों व सूरज की किरणों की तरंगों का समूह नृत्य-गान के साथ झूम उठा होगा। ताल-तलैयो व झरनों के जल में खुशियों का रंग देखते ही बनता होगा। विंध्य व हिमालय की पर्वतमालाए जिन्होंने आजादी के रक्तरंजित दृश्य को अपनी ऊचाइयों से देखा था पूरे देश को नाचते-झूमते देख कर न जाने कितने प्रसन्न हुये होंगे।


100 करोड़ की आबादी के देश में आज ऐसे कितने लोग बचे हैं जिन्होंने 15 अगस्त 1947 की उस सुनहरे पल को निहारा होगा। जिनका जन्म 1940 या उससे पहले हुआ है उन्हें ही यह सब याद होगा। लेकिन जिन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी निभाई,जिन्होंने सीना अड़ाकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया या जिन्होंने अंग्रेजों  को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया ऐसे अधिकांश लोग स्वर्ग सिधार चुके हैं। उस पीढ़़ी के जो लोग आज मौजूद है वे आजादी की लड़ाई के जख्मों के दर्द तथा ढलती उम्र की पीडा को तो झेल रहे हैं लेकिन उससे कहीं ज्यादा उन्हें देश की वर्तमान दशा का दर्द हो रहा होगा। देश में बढ़ती अराजकता,आतंकवाद, अलगाववाद,क्षेत्रीयतावाद के साथ-साथ राष्ट्र की संस्कृति की विकृति देखकर उन्हें  रोना आ रहा होगा। उनके मन की वेदना को समझने की आज फुर्सत किसे है? आजादी मिली हम बढ़ते चले गये आज भी बढ़ते जा रहा है।पूराने इतिहास को भूल कर रोज नया इतिहास गढ़ते चले जा रहे हैं। चलते-चलते 63 वर्षों में ऐसा कोई पड़ाव नहीं आया जब हम थोड़ा ठहर कर सोचते कि हम कहां जा रहे हैं ? हमारी दिशा क्या है ? हमारी मंजिल क्या है ? हमारी मान्यताए व प्राथमिकताए क्या है ?



अंग्रेजी शासन काल में सबका लक्ष्य एक था ”स्वराज” लाना लेकिन स्वराज के बाद हमारा रूप क्या होगा ? हम किस दिशा में आगे बढे़गे? इस बात पर ज्यादा विचार ही नहीं हुआ। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने 1964 में कहा था कि हमें ”स्व” का विचार करने की आवश्यकता है। बिना उसके ”स्वराज्य” का कोई अर्थ नहीं। स्वतन्त्रता हमारे विकास और सुख का साधन नहीं बन सकती। जब तक हमें अपनी असलियत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता और न उनका विकास ही संभव है। परतंत्रता में समाज का ”स्व”दब जाता है। इसीलिए राष्ट्र स्वराज्य की कामना करता हैं जिससे वे अपनी प्रकृति और गुणधर्म के अनुसार प्रयत्न करते हुए सुख की अनुभूति कर सकें। प्रकृति बलवती होती है। उसके प्रतिकुल काम करने से अथवा उसकी ओर दुर्लक्ष्य करने से कष्ट होते हैं। प्रकृति का उन्नयन कर उसे संस्कृति बनाया जा सकता है, पर उसकी अवहेलना नहीं की जा सकती। आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि किस प्रकार मानव-प्रकृति एवं भावांे की अवहेलना से व्यक्ति के जीवन में अनेक रोग पैदा हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति प्रायः उदासीन एवं अनमना रहता है। उसकी कर्म-शक्ति क्षीण हो जाती है अथवा विकृत होकर वि-पथगामिनी बन जाती है। व्यक्ति के समान राष्ट्र भी प्रकृति के प्रतिकूल चलने पर अनेक व्यथाओं का शिकार बनता है। आज भारत की अनेक समस्याओं का यही कारण है।



राष्ट्र का मार्गदर्शन करने वाले तथा राजनीतिक के क्षेत्र में काम करने वाले अधिकांश व्यक्ति इस प्रश्न की ओर उदासीन है। फलतः भारत की राजनीति, अवसरवादी एवं सिद्धान्तहीन    व्यक्तियों का अखाड़ा बन गई है। राजनीतिज्ञों तथा राजनीतिक दलो के न कोई सिद्धान्त एवं आदर्श हैं और न कोई आचार-संहिता। एक दल छोड़कर दूसरे दल में जाने में व्यक्ति को कोई संकोच नहीं होता। दलों के विघटन अथवा विभिन्न दलों की युक्ति भी होती है तो वह किसी तात्विक मतभेद अथवा समानता के आधार पर नहीं अपितु उसके मूल में चुनाव और पद ही प्र्रमुख रूप से रहते हैं।



राष्ट्रीय दृष्टि से तो हमें अपनी संस्कृति का विचार करना ही होगा, क्योंकि वह हमारी अपनी प्रकृति है। स्वराज्य का स्व-संस्कृति से घनिष्ठ सम्बंध रहता है। संस्कृति का विचार न रहा तो स्वराज्य की लड़ाई स्वार्थी, पदलोलुप लोगों की एक राजनीतिक लड़ाई मात्र रह जायेगी। स्वराज्य तभी साकार और सार्थक होगा जब वह अपनी संस्कृति के अभिव्यक्ति का साधन बन सकेगा। इस अभिव्यक्ति में हमारा विकास होगा और हमें आनंद की अनुभूति भी होगी। अतः राष्ट्रीय और मानवीय दृष्टियों से आवश्यक हो गया है कि हम भारतीय संस्कृति के तत्वों का विचार करें।



भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता यह है कि वह सम्पूर्ण जीवन का, सम्पूर्ण सृष्टि का, संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। टुकड़ों-टुकड़ों में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से ठीक हो सकता है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं। अग्रेजी शासन की दासता से मुक्ति पाने के बाद हमारी प्राथमिकता आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता होनी चाहिए थी। संस्कृति देश की आत्मा है तथा वह सदैव गतिमान रहती है। इसकी सार्थकता तभी है जब देश की जनता को उसकी आत्मानुभूति हो। विकासशील एंव धर्मपरायण भारत की दिशा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही हो सकती है। हमारे सामने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अलावा और कोई बेहतर विकल्प नहीं। स्वतत्रंता की 63वीं वर्षगांठ पर आईये हम सब देश को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की दिशा में ले जाने का संकल्प लें।00292

वन्दे मातरम... जय हिन्द...

आजादी की 63वीं वर्षगांठ पर आप सबको बधाई एवं शुभकामनाए.......

13 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार 15 अगस्त 2010 को 12:06 am  

स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनाएं।

अशोक बजाज 15 अगस्त 2010 को 12:18 am  

प्रिय मनोज जी , कैलैंडर ने तारीख बदला और आपका बधाई संदेश मिला धन्यवाद. आपको भी स्वतंत्रता दिवस की बधाई .

ललित शर्मा-للت شرما 15 अगस्त 2010 को 6:02 am  

सांस का हर सुमन है वतन के लिए
जिन्दगी एक हवन है वतन के लिए
कह गई फ़ांसियों में फ़ंसी गरदने
ये हमारा नमन है वतन के लिए

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

ललित शर्मा-للت شرما 15 अगस्त 2010 को 6:02 am  

सांस का हर सुमन है वतन के लिए
जिन्दगी एक हवन है वतन के लिए
कह गई फ़ांसियों में फ़ंसी गरदने
ये हमारा नमन है वतन के लिए

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

'उदय' 15 अगस्त 2010 को 6:35 am  

... स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं !!!

योगेन्द्र मौदगिल 15 अगस्त 2010 को 9:24 am  

lalit bhai ki tippani se prabhavit....meri bhi ise hi maan le...aalekh thoda bada ho gaya....par saarthak hak hai or haan sambhav ho to font bada kar diya karen....

BSingh 15 अगस्त 2010 को 11:16 am  

मित्रों, आपको और आप के सभी चाहने वालों को आज का दिन मुबारक हो। ब्लाग़ पर आगमन के धन्यवाद।

काजल कुमार Kajal Kumar 15 अगस्त 2010 को 2:04 pm  

धूप-छांव है देश का जीवन और ज़िम्मा भी हमारा ही है.

अशोक बजाज 15 अगस्त 2010 को 11:22 pm  

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आपको बहुत बहुत बधाई .कृपया हम उन कारणों को न उभरने दें जो परतंत्रता के लिए ज़िम्मेदार है . जय-हिंद

arun c roy 15 अगस्त 2010 को 11:50 pm  

स्वतंत्रता दिवस की बधाई और शुभकामनाएं। बहुत ज्ञानवर्धक आलेख है !

मेरे भाव 15 अगस्त 2010 को 11:51 pm  

खोजपरक आलेख ! स्वतंत्र दिवस की शुभकामना !

राजभाषा हिंदी 16 अगस्त 2010 को 5:57 am  

बहुत सुंदर प्रस्तुति।

----राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

कुमार राधारमण 16 अगस्त 2010 को 11:11 am  

स्वराज्य एक ऐसा शब्द है,जिसमें स्व-संस्कृति और राष्ट्रवाद जैसे कई भाव अंतर्निहित हैं।

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