Blogger द्वारा संचालित.
ग्राम चौपाल में आपका स्वागत है * * * * नशा हे ख़राब झन पीहू शराब * * * * जल है तो कल है * * * * स्वच्छता, समानता, सदभाव, स्वालंबन एवं समृद्धि की ओर बढ़ता समाज * * * * ग्राम चौपाल में आपका स्वागत है

सावन नहीं तो भादों में सही /छत्तीसगढ़ी कविता

>> 25 अगस्त, 2010

भादो म बरसबे, सावन असन
(छत्तीसगढ़ी कविता)


चल दिस  सावन,
पर ते जाबे झन;
सुक्खा हे धरती ,
ते रिसाबे झन;
भादो म बरसबे ,
सावन असन;


उम्मस म पसीना ले,
चुचुवावत  हे बदन;
भविष्य के चिंता म,
बूड़े हे मन ; 
भादो म बरसबे ,
सावन असन;

 

रदरद ले गिरबे ,
गरजबे झन ;
भर जाय तरिया ,
फीज जाय तन;
भादो म बरसबे ,
सावन असन;


आजा ते आजा ,
अगोरत हवन ;
खेत खार ला भरदे ,
करत हन मनन;
भादो म बरसबे,
सावन असन;
                                                - अशोक बजाज

00241

8 टिप्पणियाँ:

राजभाषा हिंदी 25 अगस्त 2010 को 8:15 am  

बहुत अच्छी कविता।
बहुत अच्छी प्रस्तुति।
*** भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है! उपयोगी सामग्री।

ललित शर्मा-للت شرما 25 अगस्त 2010 को 8:43 am  

चारों मुड़ा गजरत बरसत
सावन के बौछार हे
भादो मा हवे पुरोनी भैया
धान के भरमार हे।

गाड़ा-गाड़ा, झौंआ,झौंआ बधई
लग गे हवे रोपा
चलन दे एकसरवा निंदई

जोहार ले भैया,बने कविता केहे हस

ललित शर्मा-للت شرما 25 अगस्त 2010 को 8:43 am  

चारों मुड़ा गजरत बरसत
सावन के बौछार हे
भादो मा हवे पुरोनी भैया
धान के भरमार हे।

गाड़ा-गाड़ा, झौंआ,झौंआ बधई
लग गे हवे रोपा
चलन दे एकसरवा निंदई

जोहार ले भैया,बने कविता केहे हस

Akshita (Pakhi) 25 अगस्त 2010 को 9:50 am  

बहुत सुन्दर गीत...बधाई.
______________________
"पाखी की दुनिया' में 'मैंने भी नारियल का फल पेड़ से तोडा ...'

Swarajya karun 25 अगस्त 2010 को 10:56 am  

अब्बड़ सुघ्घर कविता . येला पढेंव त लक्षमण मस्तूरिया के
ये गीत ह सुरता आगे -
'चल चल गा किसान ,बोये चली धान
असाढ़ आगे' .
अउ हमर सियान रविशंकर शुक्ला महाराज , दुरुग
वाले घलव लिखे रिहिन -
'घानी मुनी घोर दे
पानी दमोर दे . हमर भारत देस
ल भईया ,दही दूध म बोर दे . '
तईसन आपमन घलव बहुत सुघ्घर गीत
लिखे हावव. जय जोहार .

Swarajya karun 25 अगस्त 2010 को 11:35 am  

असाढ़ माँ नी बरसेव, सावन म आधा सीसी
अईसन म आप के कविता ल पढ़ के भईया
भादों म हमर भाई लक्षमण मस्तूरिया के ये
गीत हमन ल सुरता आबेच करही -
' जुच्छा गरजे म बनय नहीं ,
अब कड़क के बरसे बर परही,
चमचम चमके म बनय नाही
अब तो आंच सहावय नाही
करवट लहे बर परही '
जय जोहार .

ओशो रजनीश 25 अगस्त 2010 को 8:18 pm  

बहुत अछि प्रस्तुति है ........

http://oshotheone.blogspot.com/

cgsongs 1 अक्तूबर 2010 को 6:11 am  

बढ़िया गीत हे, बधाई...

फेर थोकन सुधारे बर पड़ही

उम्मस म बदन ले,
चुचुवावत हे पसीना;






पढ़त पढ़त गीत सुनों, अउ छत्तीसगढ़ी गीत संगीत के मजा लो. http://cgsongs.wordpress.com

एक टिप्पणी भेजें

About This Blog

  © Blogger template Webnolia by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP