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इंटरनेट बादशाह भारत

>> 02 सितंबर, 2010

इंटरनेट बादशाह बनने की राह पर भारत


                                         भारत जल्द ही इंटरनेट की दुनिया का बड़ा खिलाड़ी बनने वाला है. 2015 तक भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़कर 23 करोड़ 70 लाख हो जाएगी. अभी आठ करोड़ से ज्यादा भारतीयों की इंटरनेट तक पहुंच है.


                                             बोस्टन के कंसल्टिंग ग्रुप की रिपोर्ट इंटरनेट्स न्यू बिलियन का कहना है कि 2015 तक ब्रिक्री देश यानी ब्राजील, रूस, भारत, चीन और इंडोनेशिया में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ कर एक अरब 20 करोड़ हो जाएगी. यह संख्या जापान और अमेरिका के इंटरनेट यूजर्स से भी काफी ज्यादा होगी. 2009 के दौरान ब्रिकी देशों में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या 61 करोड़ रही.




                                           रिपोर्ट कहती है कि 2009 से 2015 के बीच ब्रिकी देशों में इंटरनेट यूजर्स की तादाद में सालाना 9 से 20 प्रतिशत की रफ्तार से इजाफा होगा. इसकी बड़ी वजह होगी युवा पीढ़ी. ब्रिकी देश में दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी रहती है. इसलिए वहां इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली संख्या में वृद्धि को लेकर ज्यादा हैरानी भी नहीं होनी चाहिए. भारत को तेज रफ्तार के साथ बढ़ने वाला बाजार बताते हुए रिपोर्ट कहती है कि 2015 तक 19 प्रतिशत लोग इंटरनेट इस्तेमाल करने लगेंगे. फिलहाल यह तादाद सात प्रतिशत के आसपास है. इसके मुताबिक अभी भारत में 8 करोड़ 10 लाख इंटरनेट यूजर्स हैं. 2015 तक यह संख्या तीन गुनी वृद्धि के साथ 23 करोड़ 70 लाख हो जाएगी. फिलहाल चीन में दुनिया के सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं. करीब 36 करोड़.






                                          अभी भारत में ज्यादातर इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बड़े शहरों में ही रहते हैं. हालांकि वहां छोटे शहरों और कस्बों से भी लोग आकर बसे हैं. रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल भारतीय लोगों की इंटरनेट तक सीमित पहुंच है, लेकिन जल्द ही इसमें विस्तार होगा. इसके मुताबिक भारत में इंटरनेट यूजर्स औसतन आधा घंटा ही वर्ल्ड वाइड वेब की दुनिया में रहते हैं. यह ब्रिकी देशों में सबसे कम औसत है. यह औसत 2015 तक बढ़कर लगभग पौना घंटा होने की उम्मीद है. हालांकि फिर भी भारत इस मामले में अन्य ब्रिकी देशों के मुकाबले पीछे ही रहेगा.





                                  हालांकि यह एक सधा हुआ अनुमान ही है. लेकिन इंटरनेट सेवा की कीमतें घटने और नेटवर्क बढ़ने से कुछ और भी हैरान करने वाली बातें सामने आ सकती हैं. अभी बहुत कम लोगों के पास ही कंप्यूटर हैं. लेकिन इंटरनेट सुविधा वाली मोबाइल फोनों की संख्या बढ़ रही है. भारतीय बाजार में वृद्धि की बड़ी संभावना ग्रामीण क्षेत्रों में छिपी है.




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6 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा-ললিত শর্মা 3 सितंबर 2010 को 12:15 am  

इंटरनेट और कम्पयुटर सस्ते होगें तो इसका प्रचार-प्रसार और बढेगा।
1997 में मैने 150 रुपए घन्टे में इसका उपयोग किया था। जो कि 2002 में 10 रुपए प्रति घंटा हो गया और अब तो साईबर कैफ़े ही साफ़ हो गए। उस समय ISDN लाईन की जरुरत पड़ती थी स्पीड के लिए। अभनपुर में सबसे पहले मैने नेट शुरु किया था, पासवान जी ने 2 लाख रुपए स्वि्कृत करके यहां के एक्सचेन्ज में डिवाईस लगवाया था। उस समय मंत्रा का ही नेट पैकेज आया था। 1300 रुपए में मात्र 75 घन्टे का। फ़िर सत्यम ने शुरु किया, 300 रुपए में अनलिमिटेड एक माह का। लेकिन कम चलाने पर भी टेलीफ़ोन का बिल 4000/5000 से कम नहीं आता था।
उसके मुकाबले तो अब सर्विस बहुत बेहतर हो गयी है। 750 रुपए में नेट और टेलीफ़ोन सब।
आगे और भी नेट का रेट कम होने की संभावना है।
अच्छी पोस्ट के लिए आभार

अशोक बजाज 3 सितंबर 2010 को 12:30 am  

ललित जी,
इंटरनेट के शौकीनों को बड़े कठिन दौर से गुजरना पड़ा है . दूख भरे दिन बीते रे भैया ..........


त्वरित टिप्पणी के लिए आभार .

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 3 सितंबर 2010 को 6:01 pm  

बहुत सुन्‍दर जानकारी के लिए आभार भईया.

1996 में भारत में इंटरनेट के पदापर्ण के साथ ही छत्‍तीसगढ़ के पास नागपुर में बीएसएनएल के द्वारा डायलअप नेट शुरू किया गया तब हमने भी नागपुर के एक नये नवेले कैफे से फोन लाईन कांफ्रेंसिंग के द्वारा भिलाई में नेट कनेक्‍ट होते थे, आवश्‍यकता सर्फिंग नहीं, आस्ट्रिया व जर्मन से भिलाई स्‍पात संयंत्र के तकनीकि नवीनीकरण के लिये आये अंभियंतांओं के करप्‍टेड फलापी के डाटा को आस्ट्रिया व जर्मन से नेट के द्वारा मंगाना. तब लगभग 200 रूपये घंटे का खर्च होता था और डाटा घंटो डाउनलोड होते रहता था। अब तो सभी मशीन तकनीकि से इस तरह जुड गए हैं कि गलतियां सीधे चिप लेबल पर ही नेट के द्वारा सुधार दी जाती हैं।

एटी-एक्‍स से लेकर कोर टू डियो तक कम्‍प्‍यूटर हार्डवेयर से मेरा पुराना और रोचक नाता रहा है इसके कारण मुझे सूचना तकनीक के सारे उपकरण व साधन प्रिय लगते हैं. 1996 में ही मैंने जर्मन अभियंताओं से यह सीखा कि मातृभाषा के प्रति प्रेम क्‍या होता है, होता यह था कि मुझे इंटरनेट कनेक्‍ट करने के लिए उनका लैपटाप कान्फिगर करना होता था तब के उनके 486 प्रोसेसर लैपटाप में जो आपरेटिंग सिस्‍टम होता था वह जर्मन भाषा में होता था. और उनके इस भाषा प्रेम को देखकर मैं बहुत खुश होता था.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 3 सितंबर 2010 को 6:02 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 3 सितंबर 2010 को 6:02 pm  
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