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रावण की लंका में, रहना नहीं है ;

>> 16 अक्तूबर, 2010




रावण की लंका में,
रहना नहीं है ;
रावण की तरह ,
मरना नहीं है ;
अहंकार के सागर में ,
बहना नहीं है ;
है तो सोने की लंका मगर ,
जहाँ भाईचारे का गहना नहीं है ;
रावण की लंका में,
रहना नहीं है ;
राम का देश बड़ा प्यारा है ,
जहाँ किसी से हमें डरना नहीं है ;

विजयादशमी की आप सबको बहुत बहुत बधाई !! 

9 टिप्पणियाँ:

कडुवासच 16 अक्तूबर 2010 को 11:43 pm  

... बहुत सुन्दर ... बेहतरीन अभिव्यक्ति!

Swarajya karun 17 अक्तूबर 2010 को 12:05 am  

बहुत अच्छी भावनाएं . बेहतरीन अभिव्यक्ति के लिए बधाई और विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं .

विजय तिवारी " किसलय " 17 अक्तूबर 2010 को 12:22 am  

अहंकार के सागर में ,
बहाना नहीं है ;
है तो सोने की लंका मगर ,
जहाँ भाईचारे का गहना नहीं है ;
अच्छी रचना है
- विजय तिवारी 'किसलय'
जबलपुर

ब्लॉ.ललित शर्मा 17 अक्तूबर 2010 को 8:35 am  


सुंदर अभि्व्यक्ति के साथ
विजयादशमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं


दशहरा में चलें गाँव की ओर-प्यासा पनघट

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 17 अक्तूबर 2010 को 10:49 am  

भईया बेहतरीन अभिव्यक्ति के लिए आपको साधुवाद. साथ ही आपको एवं आपके परिवार, इष्ट मित्रो सहित समस्त सम्माननीय पाठकों को विजयोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं.
यह भी पढ़ें: "रावन रहित हो हर ह्रदय" http://smhabib1408.blogspot.com/

cgswar 17 अक्तूबर 2010 को 2:10 pm  

इतने जरा से शब्‍दों में सारी भावनाओं को व्‍यक्‍त करना...बधाई अशोक जी. राम के इस प्‍यारे देश में विजयदशमी पर्व पर हमारी तो है बस यही कामना कि हर देशवासी विजयी हो अच्‍छे कर्मों में.

girish pankaj 17 अक्तूबर 2010 को 4:50 pm  

vaah....kavita bhi karane lage...? badhai. blog isi tarah bheetar ke shabd-shilpi ko sakriy rakhe.

अजय कुमार झा 17 अक्तूबर 2010 को 7:16 pm  

आज के दिन के लिए सर्वथा उपयुक्त और सार्थक अशोक जी ।

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