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ग्राम चौपाल: रावण की लंका में, रहना नहीं है ;

>> 17 अक्तूबर, 2010

चिंतामग्न विभीषण 


रावण की लंका में,

रहना नहीं है ;



रावण की तरह ,
मरना नहीं है ;



अहंकार के सागर में ,
बहना नहीं है ;



है तो सोने की लंका मगर ,
जहाँ भाईचारे का गहना नहीं है ;



रावण की लंका में,
रहना नहीं है ;



राम का देश बड़ा प्यारा है ,
जहाँ किसी से हमें डरना नहीं है ;



विजयादशमी की आप सबको बहुत बहुत बधाई !!








6 टिप्पणियाँ:

S.M.MAsum 17 अक्तूबर 2010 को 12:43 pm  

आप सब को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीकात्मक त्योहार दशहरा की शुभकामनाएं.
आज आवश्यकता है , आम इंसान को ज्ञान की, जिस से वो; झाड़-फूँक, जादू टोना ,तंत्र-मंत्र, और भूतप्रेत जैसे अन्धविश्वास से भी बाहर आ सके. तभी बुराई पे अच्छाई की विजय संभव है.

राज भाटिय़ा 17 अक्तूबर 2010 को 6:30 pm  

विजयादशमी की बहुत बहुत बधाई

मनोज कुमार 17 अक्तूबर 2010 को 7:26 pm  

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोsस्तु ते॥
विजयादशमी के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

काव्यशास्त्र

शिक्षामित्र 18 अक्तूबर 2010 को 9:32 am  

ईश्वर हम सब के भीतर सद्विचार भरें।

महेन्द्र मिश्र 18 अक्तूबर 2010 को 5:24 pm  

बहुत ही प्रेरक सारगर्वित रचना .... आभार

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