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राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन की जयंती पर विशेष

>> 31 जुलाई, 2010

हिंदी के परम पक्षधर को नमन...

राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन,भारत के महान  स्वतन्त्रता सेनानी थे।उनका जन्म १ अगस्त १८८२ को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद मे हुआ। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन अपने उदार चरित्र और सादगीपूर्ण जीवन के लिए विख्यात थे तथा हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलवाने में उनकी भूमिका को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। सामाजिक जीवन में टंडन के महत्वपूर्ण योगदान के कारण सन १९६१ में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न"से सम्मानित किया गया। टंडन के व्यक्तित्व का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष उनका विधायी जीवन था, जिसमें वह आज़ादी के पूर्व एक दशक से अधिक समय तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे। वे  संविधान सभा,लोकसभा और राज्यसभा के भी सदस्य रहे।वे  समर्पित राजनयिक, हिन्दी के अनन्य सेवक, कर्मठ पत्रकार, तेजस्वी वक्ता और समाज सुधारक भी थे। 
         
                                                        
          
सन  १९५० में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। उन्हें भारत के राजनैतिक और सामाजिक जीवन में नयी चेतना एवं  नयी क्रान्ति पैदा करने वाले कर्मयोगी के रूप में जाना जाता है ।वे जन सामान्य में राजर्षि ( जो ऋषि के समान सत्कार्य में लगा हुआ हो) के नाम से प्रसिद्ध हुए।टण्डन जी का राजनीति में प्रवेश हिन्दी प्रेम के कारण  हुआ । वे हिन्दी को देश की आजादी के पहले "आजादी प्राप्त करने का" और आजादी  के बाद "आजादी को बनाये रखने का"  साधन  मानते थे।   वे  महात्मा गांधी के अनुयायी होने के बावजूद हिंदी के मामले में  उन के विचारों से  सहमत नहीं हुए। महात्मा गांधी और नेहरू राष्ट्रभाषा के नाम पर हिंदी-उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी भाषा के पक्षधर थे, जिसे देवनागरी और फारसी दोनों लिपि में लिखा जा सके, लेकिन टंडन  इस मामले में हिंदी और देवनागरी लिपि का समर्थन करते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में कामयाब रहे । मातृभाषा हिंदी के इस परम पक्षधर को उनकी जयन्ती पर  श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ  ।
                                                           

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यथार्थवादी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द

>> 30 जुलाई, 2010

मुंशी प्रेमचन्द जयन्ती पर विशेष





            मुंशी प्रेमचन्द एक अच्छे साहित्यकार  थे उन्होनें   हिन्दी,अंग्रेजी  एवं उर्दू तीनों  भाषाओँ में  अच्छी रचनाएं प्रस्तुत की। उन्होंने अपनी रचनाओं में गरीबों के दुख-दर्द को साहित्य के माध्यम से दर्शाकर समाज को दिशा देने की कोशिश की थी। यथार्थवादी साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सामाजिक विषमताओं को प्रतिपादित किया। देखा जाए तो भारतीय साहित्य का बहुत सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा वह चाहे  दलित साहित्य हो या नारी साहित्य उसकी जड़ें  गहराई तक मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई देती हैं. हमें प्रेमचंद साहित्य में  समाज के   कुचले,पिसे और हमेशा दुख का बोझ  सहने वाले पात्र नजर आते   है.प्रेमचंद के साहित्य में पहली बार किसान मिलता है.भारतीय किसान, जो खेत के मेंड़ पर खड़ा हुआ है,उसके हाथ में कुदाल है और वह पानी से सिंचाई कर  रहा है.चाहे  तपती दोपहरी हो  या कड़कड़ाती  ठण्ड या चाहे सावन की झड़ी वह मेहनत करता है और कर्ज़ उतारने की कोशिश करता है.



          मैंने बहुत पहले  मुंशी प्रेमचन्द की प्रसिद्ध कृति गोदान पढ़ी थी,गोदान का नायक होरी एक किसान है जो किसान वर्ग के प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद है।'आजीवन संघर्ष के वावजूद उसकी एक गाय की आकांक्षा पूर्ण नहीं हो पाती'। गोदान देश के   किसान के   जीवन की दशा का प्रतिबिम्ब है। 'गोदान' होरी की कहानी है, उस होरी की जो जीवन भर मेहनत करता है, अनेक कष्ट सहता है,केवल इसलिए कि उसकी मर्यादा की रक्षा हो सके और इसीलिए वह दूसरों को प्रसन्न रखने का प्रयास करता रहता  है, किंतु उसे इसका फल नहीं मिलता . अंत में उसे  मजबूर होना पड़ता है, फिर भी  वह अपनी मर्यादा नहीं बचा पाता। परिणामतः वह जप-तप के अपने जीवन को ही होम कर देता है। यह होरी की कहानी नहीं, उस काल के हर भारतीय किसान की आत्मकथा है। उनकी जयंती पर गोदान के कुछ डायलोग प्रस्तुत है -


*    आदमी का बहुत सीधा होना भी बहुत बुरा होता हैं । उसके सीधेपन का फल यह होता हैं कि कुत्ते भी मुंह चाटने लगते हैं ।

  सुख  के दिन आये तो लड़ लेना, दुख के दिन तो साथ रोने से ही कटते हैं।

*   कुत्ता हड्डी की रखवाली करे तो खाय क्या ?

*   उदासी में मौत की याद तुरंत आ जाती हैं ।

*   मैं अपनो को भी अपना नही बना सकती, वह दूसरो को भी अपना बना लेती है।

*   परदेश में भी संगी साथी निकल ही आते हैं , अम्मां और यह तो स्वारथ का संसार हैं । जिसके साथ चार पैसे गम खावो वही अपना है, खाली हांथ तो मां बाप भी नही पूछते ।

*   “ क्या तुम इतना भी नही जानते कि नारी परीक्षा नही चाहती , प्रेम चाहती हैं । परीक्षा गुणो को अवगुण , सुन्दर को असुन्दर बनाने वाली चीज हैं , प्रेम अवगुणो को गुण बनाता हैं , असुन्दर को सुन्दर ।

  मनुष्य आप ही अपना मित्र और शत्रु हैं । जिसने विवेक से अपना मन स्वाधीन कर लिया हैं वह स्वयं ही अपना हितकारी हैं और जिसने विवेक का परित्याग कर दिया हैं , वह स्वयं ही अपना शत्रु हैं ।

  मन को जितने वाले शांत  स्वभाव मनुष्य की आत्मा शीत-उष्ण , सुख-दुख , मान और सम्मान इनके होने पर भी अत्यंत स्थिर रहती हैं ।

*   स्त्री का अपने पति पर हावी होना उतना ही कष्टदायी हैं जितना की उसका वाचाल और कुलटा होना ।

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छत्तीसगढ़ में राम

छत्तीसगढ़ में राम






 
भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के बनवास काल में 10 वर्ष छत्तीसगढ़ में गुजारे हैं। यह निष्कर्ष “राम वनगमन मार्ग शोध दल”  ने अंचल का दौरा कर तथा भगवान राम से सम्बंधित विभिन्न ग्रंथों  यथा महारामायण, संवृत रामायण, नारद रामायण, लोमश रामायण, अगस्त्य रामायण, मंजुल रामायण, सौपद्य रामायण, महामाला रामायण, सौहाद्र् रामायण, मणिरत्न रामायण, सौर्य रामायण, चान्द्र रामायण, मैन्द रामायण, स्वायम्भुव रामायण, सुब्रह्य रामायण, सुवर्च रामायण, देव रामायण, श्रवण रामायण, दुरन्त रामायण, चम्पू रामायण, भावार्थ रामायण, अध्यात्म रामायण, वाल्मीकि रामायण, आनन्द रामायण, अदभुत रामायण, अग्निवेश रामायण, शेष रामायण, कौशिक रामायण, रामचरित मानस, हनुमान नाटक, अग्निपरीक्षा तथा साकेत आदि के अध्ययन के बाद निकाला हैं । वैसे महर्षि बाल्मिकी रचित “रामायण” एवं गोस्वामी तुलसीदास रचित ”श्री रामचरित मानस”बहुप्रचलित तथा सर्वमान्य हैं। यह बात सही है कि भगवान राम ने बनवास का आदेश होते ही दक्षिण की ओर रूख किया । वे अयोध्या से निकलकर रामेश्वरम एवं लंका में आक्रमण के लिए बढ़े तो छत्तीसगढ़ की धरती पर चलकर ही गये । यहां के नदियों, नालों, पहाडों एंव जंगलों को श्री राम ने अपने आंखो से निहारा है ।
यदि शोध दल की माने तो भगवान राम ने वर्तमान कोरिया जिले के भरतपुर तहसील स्थित सीतामढी-हरचैंका के समीप बहने वाली मवई नदी को पार कर छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया तथा बस्तर के कोंटा,सुकमा के आगे गोदावरी नदी को पार कर आगे बढे। इसके बाद आंध्रप्रदेश की सीमा लग जाती हैं । बस्तर के घने जंगलो को भगवान राम ने पांव से नापा हैं । तत्समय बस्तर की सीमा क्या थी यह बहस का विषय हो सकता हैं लेकिन राम ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति  व जनजीवन को नजदीक से परखा हैं। छत्तीसगढ ऋषि मुनियों मांडव ऋषि,लोमस ऋषि,अगस्त ऋषि, श्रृगी ऋषि, कंक ऋषि, मतंगऋषि, शरभंग ऋषि, गौतम ऋषि एवं मर्हिर्ष बाल्मिकी आदि की तपोभूमि हैं। बनवास काल में राम ने इन ऋषियों से ज्ञान प्रप्त किया होगा।
           वैसे भी छत्तीसगढ़ को भगवान राम का ननिहाल माना जाता है। रायपुर से 35 कि.मी. दूर ग्राम चन्दखुरी (आरंग) को कौशल्या की जन्मभूमि माना जाता है। इसीलिए पहले छत्तीसगढ़ को “कोसल प्रदेश” के नाम से जाना जाता था।
             बहरहाल राम वनगमन मार्ग शेाध दल “छत्तीसगढ़ की रामायण”नाम से लगभग 1000 पृष्ठो का ग्रंथ प्रकाशित करने का निर्णय लिया हैं, जिसे सभी वर्गो का सहयोग मिल रहा है। शोध दल ने छत्तीसगढ़ राज्य के नक्शे में राम वन गमन मार्ग को चिन्हित कर प्रकाशित किया हैं। छत्तीसगढ़ में राम तथा बस्तर (दण्डकारण्य) में राम शीर्षक से कुछ पुस्तकें भी प्रकाशित की हैं। शोध दल ने भगवान राम के वनगमन मार्ग तथा उनके पड़ाव से संबंधित स्थलों का अध्ययन कर एक सी.डी.तैयार किया हैं।

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विचार तत्व

>> 29 जुलाई, 2010

1                  हताश न होना सफलता का मूल है और यही परम सुख है। उत्साह मनुष्य को कर्मो में प्रेरित करता है और उत्साह ही कर्म को सफल बनता है।                                                       - वाल्मीकि


 
2                मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप को सदाचार से लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है।
                                                     - गौतम बुद्ध

 
3                प्रजा के सुख में ही राजा का सुख और प्रजाओं के हित में ही राजा को अपना हित समझना चाहिए। आत्मप्रियता में राजा का हित नहीं है, प्रजाओं की प्रियता में ही राजा का हित है
                                                   - चाणक्य
 
  4              अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मजबूति से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट  उद्द्‌ेश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है।
-                                                      आचार्य श्रीराम शर्मा

  5                देवमानव वे हैं, जो आदर्शों के क्रियान्वयन की योजना बनाते और सुविधा की ललक-लिप्सा को अस्वीकार करके युगधर्म के निर्वाह की काँटों भरी राह पर एकाकी चल पड़ते हैं।
                                                     आचार्य श्रीराम शर्मा
                                                                                                       ( साभार  )

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समाचार पत्रों का आभार - 2

>> 28 जुलाई, 2010

 आभार


"मंहगाई एवं नक्सलवाद पर उलझी लोकसभा एवं विधानसभा" शीर्षक से प्रकाशित 27-07-2010 के पोस्ट को दैनिक "छत्तीसगढ़ वाच" ने "स्वतंत्र विचार" स्तम्भ एवं दैनिक "छत्तीसगढ़ समाचार" ने "चौपाल" स्तम्भ में प्रकाशित किया. इसके अतिरिक्त अनेक ब्लागर मित्रों को पसंद आया . सभी को धन्यवाद.......




छत्तीसगढ़ वाच 28-07-2010


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                            छत्तीसगढ़ समाचार 28-07-2010

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महंगाई व नक्सलवाद मुद्दे पर उलझी लोकसभा व विधानसभा

>> 27 जुलाई, 2010

महंगाई व नक्सलवाद मुद्दे पर  उलझी लोकसभा व विधानसभा






देश की दो बड़़ी राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी,दो बड़ी पंचायते लोकसभा व छत्तीसगढ़ की विधानसभा देश के दो बड़े मुद्दे महंगाई और नक्सलवाद पर गरम हैं। एक ओर जहां देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई को लेकर काम रोको प्रस्ताव लाया है तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने नक्सलवाद के खिलाफ स्थगन प्रस्ताव लाकर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। मजे की बात तो यह है कि एक जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है तो दूसरी जगह कांग्रेस  गठबंधन की सरकार है। इन दो ज्वलंत मुद्दों में एक दूसरे को घेरने के लिए दोनों पक्ष मैदान में कूद पड़े है।

दोनों स्थानों पर बहस चरम सीमा पर है। बहस को धारदार बनाने के लिए एक से एक दृष्टांत दिये जा रहे हैं। मैं आज छत्तीसगढ़ की विधानसभा में  पक्ष विपक्ष के तेवर देख रहा था। आरोप प्रत्यारोप के दौर चल रहे थे। भाजपा वाले कह रहे थे कि नक्सलवाद केवल छत्तीसगढ़ की समस्या नहीं बल्कि यह राष्ट्रीय समस्या है,जब केन्द्र व राज्य दोनों जगह कांगे्रस की सरकार थी तब से इस समस्या ने विकराल रूप ले लिया है,इस समस्या के लिए केवल छत्तीसगढ़ की वर्तमान सरकार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। दूसरी ओर कांग्रेस वाले सरकार पर अकर्मण्यता का आरोप जड़ रहे थे। उनका कहना था कि नक्सलवाद से बस्तर में कारगिल से ज्यादा लोग शहीद हुये हैं। कुछ विपक्षी सदस्यों ने सरकार पर नक्सलवादियों से मिली भगत का भी आरोप लगाया। एक जिम्मेदार विपक्षी नेता ने तो यहां तक कह दिया कि सरकार में बैठे जिम्मेदार लोगों की नक्सलियों से सांठगांठ है। भाजपा ने बस्तर की 12 विधानससभा सीटों में से 11 सीटों पर विजय पाई है, यह भी एक मुद्दा था। विपक्ष का कहना था कि भारतीय जनता पार्टी ने नक्सलियों से सांठगांठ कर 11 सीटे हासिल की है।



इस बीच लंच ब्रेक हो गया। स्पीकर द्वारा लंच के लिए कार्यवाही स्थगित करते ही लगा कि विपक्ष का स्थगन प्रस्ताव ठंडा पर गया है। क्योंकि स्थगन प्र्रस्ताव का अर्थ होता है सब काम छोड़ कर (या ठप्प कर) जो सूचना दी गई है उस पर चर्चा कराना लेकिन पक्ष के साथ विपक्ष लंच पर चला गया।

जहां तक लोकसभा का सवाल है। यह देश की सबसे बड़ी पंचायत है। यहां प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने महंगाई के खिलाफ ”काम रोको प्रस्ताव ”लाया है। महंगाई एक ज्वलंत मुद्दा है। इससे सभी वर्ग के लोग त्रस्त है। मध्यम एवं निम्न आय वर्ग के लोगों की परेशानी बढ़ गई है। ” आमदानी अठन्नी खर्चा रूपैय्या ” वाली कहावत जगह चरितार्थ हो रही है। पेट्रोल डीजल व रसोई गैस के दाम बढ़ाकर सरकार ने लोगों को आफत में डाल दिया तथा स्वयं आफत मोल ले लिया। इ्र्रधन के दाम बढ़ने का असर दैनिक उपभोग की वस्तुओं पर पड़ रहा है। लोकसभा में महंगाई के खिलाफ ” काम रोको प्रस्ताव ” पर सारा विपक्ष एक जुट दिखाई  दे रहा है। संयुक्त विपक्ष के हंगामें के चलते स्पीकर को बार-बार कार्यवाही स्थगित करनी पड़ रही है। इस ”काम रोको प्रस्ताव ”का सरकार की सेहत पर क्या असर पडे़गा यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन आम आदमी की मुसीबतों का अंत होगा इसमे संदेह है।


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सावन की झड़ी

                                     सावन की झड़ी


सावन की झड़ी आज भी दिन भर लगी रही ;अभी रात १२.२६ बजे जब मै यह पोस्ट लिख रहा हूँ ,बारिस का क्रम जारी है .नदी नाले उफान पर है .शाम को महासमुंद से लौटते वक्त छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी नदी महानदी में जलस्तर को बढ़ते देखा .झुग्गियों एवं निचली बस्तियों में बुरा हाल है .अब बरसात को कुछ दिनों के लिए थम जाना चाहिए अन्यथा जान-मॉल की हानि हो सकती है .साधना न्यूज चैनल के द्वितीय वर्ष गांठ पर आयोजित कविसम्मेलन से अभी अभी लौटा हूँ .बड़े नामी कविवर उपस्थित थे लेकिन श्रोताओ का अकाल पड़ा हुआ था.श्रोताओ की छ्निं उपस्थिति का मलाल आयोजको को तो था ही कवियों की वेदना से भी समझ आ रहा था लेकिन अतिविष्टि से प्रभावित लोगों की वेदना को कौन समझेगा?


       दिनांक - 26-07-2010          फोटो - हरिभूमि रायपुर   

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आया सावन : भाया सावन : छाया सावन

>> 25 जुलाई, 2010


आया सावन : भाया सावन : छाया सावन

कल रात से झमाझम बारिश हो रही हैं । पूरी धरती तरबतर हो चुकी  हैं । वैसे तो मानसून को आये एक महीने हो गये हैं लेकिन ऐसी व्यापक व तेज वर्षा पहली बार हो रही हैं । मानसूनी वर्षा भी इस बार खंड खंड हो रही थी । यदि किसी एक इलाके में बारिश होती थी तो दूसरे इलाके में तेज धूप निकली होती थी । यहां तक देखने को मिला कि एक गांव में एक दिशा में बारिश होती तो दूसरी दिशा के लोगो को बाद में पता चलता था क्योंकि वहां धूप निकली होती थी । पिछले 10दिनो से पारा फिर चढ़ने लगा था । गर्मी व उमस से लोग हलाकान थे । किसानो के चेहरे पर चिन्ता की रेखाएं स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही थी । ईश्वर की कृपा से धान की बोनी तो हो चुकी हैं लेकिन रोपणी का कार्य रूका पड़ा हैं । किसान दिन भर आसमान की ओर टकटकी लगायें रहते थे । बादल बनते थे पर हवा के झोंको से बिखर जाते थे । मौसम विभाग की भविष्यवाणी पर भी लोग चर्चा करते थे , कुछ लोगो को मौसम वैज्ञानिको की भविष्यवाणी पर भरोसा नही रहता , वे कहते हैं कि जब जब मौसम वैज्ञानिक तेज वर्षा की भविष्यवाणी करते हैं तब तब सूखा पड़ता हैं । बहरहाल पिछले एक माह से खंड वर्षा हो रही थी । लोगो को सावन का इंतजार था । सावन लगने में अभी कुछ ही  घंटे शेष हैं, आज गुरूपूर्णिमा है । सभी लोग गुरूओं का आशीर्वाद लेने अथवा इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमो की तैयारी में व्यस्त हैं मौसम ने कल रात से अचानक पलटा मारा ,उमड़ घुमड़ कर बादल आयें और तेज बारिश रात भर होती रही । अभी भी बारिश की संभावना बनी हुई है । सूरज देवता बादलो में ढके हुये हैं । गुरूपुर्णिमा के दिन सूरज देव को भी अपने गुरू के दर्शन की आस होगी , मैं नही जानता कि उनके गुरू कौन है लेकिन आसमान में मंडराते घने काले बादल उनके गुरूदर्शन में अवरोध पैदा कर रहे हैं । पर हम क्या करे ,हमें तो पानी चाहिए ,सो बरसात हो रही हैं । इस बरसात ने धरती की प्यास बुझा दी हैं । जंगलो ,बाग-बगीचो एंव क्यारियो की हरी-भरी पत्तियां खूब इठला रही हैं शायद वो भी सूरज देवता को चिढ़ाना चाहती हैं लेकिन बादल हैं कि छंटने का नाम ही नही ले रहें हैं । इन पंक्तियों के लिखे जाने तक तेज बारिश जारी है.रायपुर के अलावा प्रदेश के विभिन्न हिस्सो दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा, महासमुंद, धमतरी, बस्तर, दतेंवाडा, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, कोण्डागांव, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, कोरबा, रायगढ, जशपुर, कोरिया एवं अंबिकापुर में भी तेज बारिश का सिलसिला जारी है। रायपुर जिले के अभनपुर, फिगेश्वर, छुरा, गरियाबंद, मैनपुर, देवभोग, आरंग, धरसींवा, सिमगा, तिल्दा-नेवरा, भाटापारा, बलौदाबाजार, पलारी,कसडोल एवं बिलाईगढ में भी खूब बारिश के समाचार मिल रहें है। महानदी के अलावा पैरी, सोढुल, खारुन, शिवनाथ, अरपा एवं जोंक आदि नदियों का जल स्तर भी तेजी से बढ रहा है। देश के अन्य प्रातों में भी लगभग यही स्थिति है।

सावन खुशहाली और हरियाली का प्रतीक माना जाता हैं । सावन समृद्धि का प्रतीक हैं तभी तो कहा जाता हैं - “सावन के अंधे को सब हरा ही हरा नजर आता हैं”। बड़ा अनसुलझा सवाल है यह कि सावन के अंधे को सब हरा ही हरा क्यो सूझता हैं । भारत -पाक बटवारे के समय 14-15 अगस्त को सावन का ही महीना रहा होगा , इसलिए तो कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान को हरा ही हरा सूझता हैं । वरना 63वर्षो से झंझावात झेल रही कश्मीर की वादियां तो सूख रही है।

छत्तीसगढ में एक मुहावरा प्रचलित है-  “सावन साग न भादो दही. क्वार करेला कार्तिक मही. मरही नही तो पडही सही“  इस मुहावरे के माध्यम से खान पान को लेकर हिदायत दी गई है। इस का अर्थ है कि यदि खान पान में ध्यान नहीं दिया गया तो आदमी मरेगा नहीं तो बीमार जरुर पडेगा। सावन के महिने में खान पान को लेकर विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।

फिल्मों में सावन के गीतो की भरमार हैं । लता मंगेशकर और मुकेश द्वारा  फिल्म "मिलन"का गाया गीत “सावन का महीना पवन करे शेार जियरा रे झूमें ऐसे , जैसे बन मा नाचे मोर” आज भी तरोताजा है। इसी प्रकार सावन से संबंधित फिल्म "चुपके चुपके", "जुर्माना", "निगाहें", "बहू बेगम", एवं "आया सावन झुम के"  के गीत आज भी हीट है तथा बरसात में लोगो के गुनगुनाने के लिए मजबूर करतें है

सावन भक्ति का महिना है महिने भर शिवजी की आराधना होती है।चारो तरफ ''बोल बम'' के नजारे देखने को मिलते है कांवडियो की टोली रंग बिरंगे कांवर लेकर शिवजी को जल चढाने के लिए लंबी लबीं दौड लगाते है। शिवजी भोले भंडारी है इसलिए तो उन्हे लोग केवल जल चढा कर अपनी मुराद पूरी करतें है। सावन में सोमवार का दिन अतिमहत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन जलाभिषेक करने लोग शिव मंदिरो में उमड पडते है। मंदिरो में ॐ  नमः शिवायः का मंत्र दिनभर गुंजायमान होता है।



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अपरम्पार है गुरू की महिमा


ज गुरु पूर्णिमा है , इस अवसर पर सभी गुरुओं को प्रणाम करता हूं जिनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान रुपी प्रकाश से जीवन आलोकित हुआ . गुरु के ज्ञान से ही जीवन की इस लंबी और काँटों भरी डगर में चलना  आसान हुआ है.
  गुरुवाय  नम:

बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि  सुबास  सरस  अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥

 अर्थ --- मैं गुरु के चरण कमलों की रज की वन्दना करता हूँ जो सुरुचि, सुंदर, स्वाद, सुगंध तथा अनुराग रूपी रस से पूर्ण है। वह अमर मूल संजीवनी जड़ी का सुंदर चूर्ण है जो सम्पूर्ण भव रोगों के परिवार को नाश करने वाला है. 
*


बलिहारी  गुरु  आपकी  घरी घरी सौ बार॥
मानुष तैं देवता किया करत न लागी बार॥


अर्थ --- मैं अपने गुरु पर प्रत्येक क्षण सैकड़ों बार समर्पित हूँ जिन्होने  मुझे बिना विलम्ब के मनुष्य से देवता कर दिया.
*

गोस्वामी तुलसीदास नें भी श्री रामचरित मानस की रचना करने के पूर्व अपने गुरु की वंदना करते हुये यह सोरठा लिखा है : --------


बंदउँ  गुरु  पद  कंज  कृपा  सिंधु  नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥


अर्थ --- तुलसी दास जी नें कहा है कि मैं उन गुरु महाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ जो कृपा के समुद्र और नर रूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूपी घने अन्धकार का नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं.
*

पंडित पाढ़ि गुनि पचि मुये गुरु बिना मिलै न ज्ञान ।
ज्ञान  बिना  नहिं  मुक्ति  है  सत्त  शब्द  परनाम॥


अर्थ --- गुरु का स्थान गोविन्द से भी बढ़कर होता है. सद्गुरु के बिना तो परमार्थ की प्राप्ति हो ही नही सकती. माता पिता  तो जन्म देते हैं किन्तु वो गुरु ही है जो हम आपको को मनुष्य बनाते हैं. गुरु के बिना ज्ञान नही मिलता और ज्ञान के बिना मनुष्य पशु से बढ़कर नही. 

*


गुरु  गोविन्द  दोउ  खडे ,  काके  लागूं  पाय।
बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो मिलाय॥
अर्थ ---  जब हम संशय की स्थिति में होते है तब गुरु ही हमें मार्ग बताते  है .


*

श्री गुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती॥
दलन   मोह   तम  सो  सप्रकासू। बड़े   भाग  उर   आवइ   जासू॥
 अर्थ ---  श्री गुरु महाराज के चरण नखों  की ज्योति मणियो के प्रकाश के समान है जिसके स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न हो जाती है.वह प्रकाश अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करने वाला है वह जिसके हृदय में आ जाता है उसके बड़े भाग्य हैं. 
*


हरिहर आदिक जगत में पूज्य देव जो कोय ।
सदगुरु  की  पूजा  किये  सबकी  पूजा  होय ॥


अर्थ ---  कितने ही कर्म करो, कितनी ही उपासनाएँ करो, कितने ही व्रत और अनुष्ठान करो, कितना ही धन इकट्ठा कर लो और् कितना ही दुनिया का राज पा लो लेकिन जब तक सदगुरु के दिल का राज तुम्हारे दिल तक नहीं पहुँचता तब तक सदगुरुओं के दिल के खजाने तुम्हारे दिल तक नही उँडेले जायेंगे . इसी प्रकार जब तक तुम्हारा दिल सदगुरुओं के दिल को झेलने के काबिल नहीं बनता तब तक सब कर्म उपासनाएँ पूजाएँ अधुरी रह जाती हैं.यह  अच्छी तरह समझ लो कि  देवी  देवताओं   की पूजा के बाद भी कोई पूजा शेष रह जाती है, किंतु सदगुरु की पूजा के बाद कोई पूजा नहीं बचती.

*

सत गहेए सतगुरु को चीन्हे सतनाम विश्वासा॥

कहै कबीर साधन हितकारी हम साधन के दासा॥
 अर्थ ---  प्रत्येक मानव को गुरु भक्ति और साधन का अभ्यास करना चाहिए। इस सत्य की प्राप्ति से सब अवरोध समाप्त हो जाते हैं.

*


सदगुरू की महिमा अनंत, अनंत कियो उपकार ॥
अनंत   लोचन   उघडिया   अनंत  दिखावन हार॥
अर्थ --- वास्तव में गुरु की महिमा अनंत है गुरु नें मुझ पर अनेको उपकार किए है उन्होने मेरी बंद आंखो को खोलकर मुझे सत्मार्ग में चलने की प्रेरणा दी.
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गुरु  ब्रम्हा ,  गुरु  विष्णु  ,  गुरु   देवो   महेश्वर:
गुरु साक्षात् पर ब्रम्हा तस्मे श्री गुरुवे नमो नमः
  
 हे गुरुदेव !आपके श्रीचरणों में अनंत कोटि प्रणाम करते हुए परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ  कि आप जिस पद में विश्रांति पा रहे हैं , हम भी उसी पद में विशांति पाने के काबिल हो जायें अब आत्मा-परमात्मा से जुदाई की घड़ियाँ ज्यादा न रहें. ईश्वर करे कि ईश्वर से हमारी प्रीति बढ जायें तथा प्रभु करे कि गुरु-शिष्य का सम्बंध और प्रगाढ हो जायें.

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समाचार पत्रों का आभार

>> 24 जुलाई, 2010

समाचार पत्रों का आभार

रेडियो प्रसारण दिवस पर २३ जुलाई को "भारत में रेडियो के बढते कदम" शीर्षक से प्रकाशित पोस्ट को रायपुर के अनेक दैनिक समाचार पत्रों नें प्रकाशित किया है देश के अन्य भागो से भी कुछ मित्रो नें समाचार पत्रों में पढने के बाद मुझे बधाई दी.आप के शहर के किसी अखबार में भी यदि छपा हो तो कृपया मुझे सूचित करने का कष्ट करेंगे .ग्राम चौपाल आभारी है दैनिक नेशनल लुक, दैनिक नई दुनिया, दैनिक प्रतिदिन, दैनिक छत्तीसगढ़ समाचार, दैनिक तरुण छत्तीसगढ़ एंव दैनिक पेज-९ का जिन्होंने इस आलेख को प्रमुखता से प्रकाशित किया.






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रेडियो प्रसारण दिवस

>> 23 जुलाई, 2010

भारत में रेडियो के बढ़ते कदम

आज प्रसारण दिवस है। देश के लिए नई उपलब्धियों का तथा रेडियों श्रोताओं के लिए यह खुशी का दिन है। 83 वर्ष पूर्व 23 जुलाई 1927 को भारत में रेडियो का पहला प्रसारण बम्बई से हुआ। दुनिया में रेडियो प्रसारण का इतिहास काफी पुराना नहीं है। सन 1900में मारकोनी ने इंग्लैण्ड से अमरीका बेतार संदेश भेजकर व्यक्तिगत रेडियो संदेश की शुरूआत की। इसके बाद कनाडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेंसडेन ने 24 दिसम्बर 1906 को रेडियो प्रसारण की शुरूआत की। उन्होंने जब वायलिन बजाया तो अटलांटिक महासागर में विचरण कर रहे जहाजों के रेडियो आपरेटरों ने अपने-अपने रेडियो सेट में सुना। कल्पना कीजिये कितना सुखद क्षण रहा होगा,लोग झूम उठे होंगे। संचार युग में प्रवेश का यह प्रथम पड़ाव था। उसके बाद पिछले 104वर्षों का इतिहास बड़ा रोचक है। विज्ञान ने खूब प्रगति की। संचार के क्षेत्र में दुनिया बहुत आगे बढ़ चुकी है।


भारत में 23जुलाई 1927 को प्रायोगिक तौर पर प्रसारण शुरू किया गयां उस समय की भारत सरकार एवं इंडियन ब्राडकास्टिंग लिमिटेड के बीच समझौते के तहत रेडियो प्रसारण प्रारंभ हुआ। यह कंपनी 1930में निस्तारण में चली गई तो इसका राष्ट्रीयकरण कर  ”इंडियन ब्राड कास्टिंग कारपोरेशन रखा गया। आजादी के बाद 1956-57 में इसका नाम आल  इंडिया रेडियो या आकाशवाणी रखा गया। जहां तक आकाशवाणी का सवाल है,आजादी के समय 1947 में इसका केवल 6 केन्द्रों एवं 18 ट्रांसमीटरों का नेटवर्क  था तथा उसकी पहुंच केवल 11 प्रतिशत लोगों तक थी। आज आकाशवाणी के 231 केन्द्र तथा 373 ट्रासमीटर है तथा इसकी पहुंच 99 प्रतिशत लोगों तक है। भारत जैसे बहु संस्कृति,बहुभाषी देश में आकाशवाणी से 24भाषाओं में इसकी घरेलू सेवा का  प्रसारण होता है। आकाशवाणी मिडियम वेव, शार्ट वेव एवं एफ.एम के माध्यम से प्रसारण सेवा प्रदान करती है।


तब और अब में आज कितना फर्क हो गया है। एक समय था जब रेडियो ही संचार का प्रमुख साधन था लेकिन आज जमाना बदल गया है। धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक बैठा व्यक्ति सतत् एक दूसरे के संपर्क में रहता है। दुनिया के किसी भी कोने में कोई भी घटना हो पलभर में सभी जगह प्रसारित हो जाती है। तेज गति से चल रहे इस कॉलखण्ड में रेडियो की बात बड़ी असहज लगती होगी लेकिन यह सच है कि किसी जमाने में रेडियो की अपनी अलग ही शान थी। रेडियो रखना, रेडियो सुनना और रेडियो के कार्यक्रमों में भाग लेना गौरव की बात होती थी। टेलीविजन के आने के बाद रेडियो श्रोताओं में कमी आई है लेकिन एफ.एम के आने के बाद अब पुनः रेडियो के दिन लौट रहे हैं।


आजादी के बाद रेडियो का इतिहास सरकारी ही रहा है। भारत में रेडियो सरकारी नियंत्रण में ही रहा है। आम आदमी को रेडियो चलाने की अनुमति हेतु अनेक क्षेत्रों से दबाव आया। सन् 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि रेडियो तरंगों पर सरकार का एकाधिकार नहीं है। सन् २००२ में एन.डी.ए.सरकार ने शिक्षण संस्थानों को कैंपस रेडियो स्टेशन खोलने की अनुमति दी। उसके बाद 2006 में शासन ने स्वयंसेवी संस्थाओं को रेडियो स्टेशन चलाने की अनुमति दी। परंतु इन रेडियो स्टेशनों से समाचार या सम-सामयिक विषयों पर चर्चा के प्रसारण पर पाबंदी है। फिर भी यह रेडियो जगत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है.
बहरहाल आकाशवाणी नें 23जुलाई 1927 से अब तक 83  वर्ष कि यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की है तथा तमाम अवरोधों के बावजूद वह पूरी गति के साथ आगे बढ़ रही है आकाशवाणी परिवार के साथ साथ सभी श्रोताओं को प्रसारण दिवस की हार्दिक बधाई  

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भामाशाह जिन्दा है

>> 21 जुलाई, 2010

दानवीर लाहावती एंव दुकलहीन बाई बनी प्रेरणा श्रोत 


भारत में दान देने की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है। राजा हरिश्चंद्र से लेकर भामाशाह तक की कथा हम लोग नित्य पढ़ते-सुनते है। जिन्होने देश-धर्म के लिए सर्वस्व न्योछावार कर दिया था। इसी श्रेणी में भील आदिवासी एकलव्य का भी नाम आता है जिसने गुरू द्रोणाचार्य के कहने पर अपना अंगूठा ही दान कर दिया। इसीलिए भारत को त्यागियों,तपस्यिों एवं बलिदानियों का देश कहा जाता है।

वर्तमान समय में जो संस्कृति विकसित हुई हैं उसमें दानशीलता का कहीं कोई स्थान नहीं है। हर कोई हड़पने में लगा है। लोग देश व समाज के बजाय ”मैं और मेरा परिवार” की भावना लेकर चल रहे हैं। देश व समाज के प्रति कर्तव्यों की अनदेखी कर रहे हैं, तथा केवल अधिकार की बात करते हैं।

प्रायः सभी लोग मानते है कि शिक्षा, स्वास्थ, सड़क, पानी व बिजली जैसी अति-आवश्यक चीजों को मुहैया कराना केवल सरकार का काम है। हमारा काम केवल उपभोग करना है। एक जमाना था जब लोग तालाब और   कुंआ खुदवाते थे,बगीचे लगवाते थे ताकि पर्यावरण की सुरक्षा हो सके लेकिन अब ऐसी बातें  काल्पनिक लगने लगी है।

दिनांक २१-०७-२०१० को गांव के एक गरीब परिवार ने 10 लाख रू. का हाईस्कूल भवन बनाकर शासन को दान किया। यह प्रसंग है छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर जिले के अंतर्गत अभनपुर विकासखण्ड के ग्राम कुर्रू का। इस गांव की अनुसूचित जाति वर्ग की महिला श्रीमती लाहाबती पति श्री बुधारू कोठारी ने अपने पिता स्व. सुखरू राम बंजारे के स्मृति में न केवल 10 लाख रू. का हाईस्कूल भवन बनाया बल्कि दो लाख रू. अतिरिक्त दिया। श्रीमती लाहाबती कोठारी ने शिक्षा की ज्योति जलाने के लिए अनुकरणीय कार्य किया है। छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल शेखरदत्त ने आज स्वयं कुर्रू गांव जाकर श्रीमती लाहाबती एवं उसके पति का सम्मान किया। राज्यपाल महोदय का यह कदम वास्तव में बहुत ही सराहनीय है। समाज को नई   प्रेरणा   देने वाले ऐसे शख्शियत का सम्मान करने यदि राज्य के सत्ता प्रमुख स्वयं उसके गांव पहुंचे तो अन्य लोगों को प्रेरणा तो मिलेगी ही.

ऐसा ही एक प्रसंग 24 अप्रैल 2010 को देखने को मिला जब अभनपुर ब्लाक के ग्राम मुड़रा की आदिवासी वृद्ध महिला श्रीमती दुकलहीन बाई ने एक-एक रूपिये एकत्र कर 5 लाख रूपिये का शाला भवन बनाकर दान किया। मजे की बात तो यह है श्रीमती दुकलहीन बाई ध्रुव  स्वयं अनपढ़ है। उसकी कोई संतान नहीं है तथा जीवन के अंतिम पड़ाव में है। शासन के ग्राम सुराज अभियान के अंतर्गत जिले के शिक्षा मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल जब ग्राम मुड़रा पहुंचे तो वह फूले नहीं समा रही थी। मंत्री जी के हाथों सम्मानीत होते उसकी आखें भर आई।

वर्तमान समय मे ऐसे प्रसंग कम ही आते हैं। यदि ऐसे दानवीरों को सुर्खियां मिलेगी, सम्मान मिलेगा तो नई पीढ़ी को इससे प्रेरणा मिलेगी। जब महामहिम राज्यपाल महोदय ने श्रीमती लाहाबती का सम्मान किया उस अवसर पर न केवल पूरा कुर्रू गांव बल्कि पचेड़ा, खंडवा, चेरिया, पौंता, बंजारी, उपरवारा, सुन्दरकेरा, कठिया, जामगांव, खोला, तूता, निमोरा,मानिकचौरी , गोबरा नवापारा, पटेवा, सिवनी, डोमा, मोखेतरा, तामासिवनी, तोरला, पोड़, मंदलोर, तेन्दूवा के अलावा न्यू रायपुर से जुड़े गांव के लोग भी भारी संख्या में उपस्थित थे।

   

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मनुष्य

>> 18 जुलाई, 2010

मनुष्य   पद ,  पैसे   व   जाति   से  महान   नहीं  बनता ;  मनुष्य     महान  बनता  है  अपने   कर्म , व्यवहार  एवं  ज्ञान से      -  कबीर

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भारत पाक वार्ता : शांति बनाम क्रांति

>> 17 जुलाई, 2010

पिछले गुरुवार को भारत -पाकिस्तान वार्ता विफल हो गई ,भारत के विदेश मंत्री एस.एम् .कृष्णा बैरंग लौट आये .सिवाय अपमान के भारत को कुछ  हासिल नहीं हुआ.  ना जाने इस प्रकार की वार्ता कब तक चलती रहेगी ,कब तक भारत को अपमान का घूंट पीना पड़ेगा . पाकिस्तान के विदेश मंत्री   शाह महमूद कुरैशी  ने भारतीय विदेश मंत्री के खिलाफ  जो टिपण्णी  की है वह बहुत ही अमर्यादित एवं असहनीय है .इस अमर्यादित टिपण्णी के बाद प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह  का यह कहना कि  सभी मुद्दों पर बातचीत होगी ,बड़ा आश्चर्य जनक है. गुरूवार की घटना के बाद पाकिस्तान से मर्यादा की आस करना व्यर्थ है. एक तरफ तो  भारत की शांति की नीति रही है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान क्रांति चाहता है.   

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प्रदूषण के खिलाफ जंग-- हरियर अभियान

            




 छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 20 कि. मी. दूर रायपुर में आज एक लाख पौधे रोप कर नया इतिहास रचा है। छत्तीसगढ़ के गर्वनर शेखरदत्त, मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह, उनके मंत्रीमंडल के सदस्य, जनप्रतिनिधि, अधिकारी, कर्मचारी, किसान, मजदूर एवं स्कूली बच्चे सबने इस पावन कार्य पर होम दिया। चारो तरफ उत्साह और उमंग का माहौल दृष्टिगोचर हो रहा था । स्कूली बच्चो में काफी उत्साह दिखाई दे रहा था। नई राजधानी स्थल में पहली बार आने की खुशी भी थी । सबने पेड़ लगाये। कितना अदभुत दृश्य था। हजारो के संख्या में लोग पौधे रोप रहे थे ।

        हरियर अभियान का शुभारंभ नई राजधानी से किया गया । नई राजधानी हरी भरी एवं खूबसूरत होगी इसकी कल्पना की जा सकती है। एक साल बाद जब नई राजधानी में जब काम काज शुरू होगा तब तक ये पौधे अपना जड़ जमा लेगें । पर्यावरण को स्वच्छ और सुन्दर बनायेगें । आज का अभियान पर्यावरण की रक्षा के लिये आवश्यक था । नई पीढ़ी ने पेड़ के महत्ता  को आज समझा है । दरअसल हरियर अभियान प्रदुषण के खिलाफ एक जंग है इसमें सबको ‘शामिल होना चाहिए। प्रदूषण से देश को बचाना है । हर नागरिक को  शुद्ध वातावरण में जीने का अधिकार  है । प्रदूषण के खिलाफ इस जंग में जनता की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

खूबसूरत राजधानी का सपना :-
                    इस कार्यक्रम के बहाने बहुतों ने आज नई राजधानी का सिंहावलोकन किया । चारो तरफ सड़को का जाल बिछ रहा है । रायपुर,अभनपुर, आरंग व मंदिरहसौद से नई राजधानी को जोड़ने के लिए फोरलेन व सिक्सलेन की सड़को का निर्माण हो रहा है । मंत्रालय एवं अन्य कार्यालयीन भवनो का निर्माण व्यवस्थित ढंग से हो रहा है देश की सबसे खूबसूरत राजधानी बनाने का वर्तमान सरकार का सपना साकार होता दिखाई दे रहा है ।

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महंगाई डायन खाय जात है.........

>> 16 जुलाई, 2010



इन दिनो फिल्म “ पिपली (लाईव) ” का यह गीत खूब चल पड़ा है ठीक वैसे ही जैसे कि पिछले एक दो वर्षो से “ सास गारी देवे ...... ” वाला गीत चल रहा है । फिल्म “ पिपली (लाईव) ” का भविष्य तो मै नही जानता शायद आक्टोपस पॅाल बाबा ही बता पाएंगे लेकिन इतना तय है कि यह गीत जरूर हीट हो जायेगा । गायक श्री रघुवीर यादव एवं उनकी मंडली को इस गीत से प्रसिध्दि तो मिल ही रही है। उपर से स्वर कोकिला लता मंगेश्कर ने इस गीत की तारीफ करके सोने में सुहागा कर दिया है। 

छत्तीसगढ़ के लोकगीत यहां की जान है
अपने ब्लॅाग में इस गीत का जिक्र करने के पीछे पहला कारण तो यह है कि यह गीत लोकधुनो पर आधारित है । हमारे देश में लोकगीतो का काफी महत्व है । वास्तव मे लोकधुनो में काफी मिठास होती है । प्रत्येक प्रांत या क्षेत्र में अलग अलग मौसम या तीज त्योहारो में बजाये या गाये जाने वाले लोकगीतो का अपना अलग ही आनंद है । “ महंगाई डायल खाय जात है......... “ भी लोकधुन पर आधारित है । गायक रघुवीर यादव व सहायक कलाकारो ने परम्परागत वाद्य यंत्रो में इस गाने को लय व ताल दिया है। सबसे बडी विशेषता यह है कि इस गीत में कही भी अत्याधुनिक वाद्य यंत्रो का इस्तेमाल नही किया गया है । ऐसे गीत पीढ़ी दर पीढ़ी बजाये जा रहे है, लेकिन उचित अवसर के अभाव में इन गीतो का धुन क्षेत्र से बाहर नही निकल पाता। फिल्म स्टॅार अमीर खान के द्वारा जैसे ही इसे प्लेटफार्म मिला यह हिट हो गया। छत्तीसगढ़ के विभिन्न तीज त्योहारो व संस्कारो में गाये जाने वाले गीतो को बार बार सुनने का जी करता है । छत्तीसगढ़ के लोकगीत यहां की जान है। समस्या यह है कि इन गीतो की मौलिकता कैसे बरकरार रहें । पाश्चात्य व बम्बईयां संगीत की खिचड़ी का दुष्प्रभाव छत्तीसगढ़ी लोक गीतो पर नही पड़ना चाहिए ।

 
आम आदमी की पीड़ा की अभिव्यक्ति 
इस चर्चा को ब्लाग में शामिल करने का दूसरा प्रमुख कारण यह है कि इस गीत में “ महंगाई ” जैसे ज्वलंत मुद्दे को शामिल किया गया है । वास्तव में यह गीत आम आदमी की पीड़ा की अभिव्यक्ति है । आज हर व्यक्ति मंहगाई से ग्रस्त है। निम्न व मघ्यम वर्ग के लोगो का तो बड़ा बूरा हाल है । इस गीत में आम आदमी की दशा का चिन्तन बहुत ही खूबसूरत ढंग से किया गया है।“ और आगे का कहूं, कहे नही जात है. महंगाई डायन खाय जात है ........... ”

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रुपए की धाक

>> 15 जुलाई, 2010


अब रुपए को भी मिला उसका चेहरा

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आईआईटी मुंबई के शोध छात्र डी उदय कुमार के डिजाइन को रुपए के प्रतीक के रूप में चुन लिया है. केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने गुरुवार को हुई कैबिनेट की बैठक के बाद इसकी जानकारी दी। रुपए का प्रतीक बनाने के लिए रिज़र्व बैंक आफ़ इंडिया ने लोगों से डिजाइन आमंत्रित किया था.इसके लिए रिज़र्व बैंक ने ढाई लाख रुपए का ईनाम देने की घोषणा की थी.

रुपए की धाक

देश भर से क़रीब तीन हज़ार लोगों ने रुपए के प्रतीक का डिजाइन बनाकर भेजा था.रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर की अध्यक्षता वाली एक ज्यूरी ने इन तीन हज़ार प्रतीकों में से आखिर में पाँच को चुना. इन्ही पांच में एक डिजाइन को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। इसके साथ ही रूपया दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया है जिनकी मुद्रा का अपना प्रतीक है। अंबिका सोनी ने बताया कि अब इसे देश और देश के बाहर लोग और संस्थाएँ इसका उपयोग कर सकती हैं. ,डी उदय कुमार ने संवाददाताओं से कहा,''रुपए के लिए मेरा डिजाइन चुना गया है. मैं बहुत खुश हूं लेकिन ख़ुशी जताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं.उन्होंने कहा कि यह उनके लिए बड़े सम्मान की बात है.
रुपए के प्रतीक की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि यह देवनागरी लिपि का अक्षर 'र' है। उन्होंने बताया कि रुपए का प्रतीक रोमन लिपि के बड़े 'आर' की तरह भी दिखता है.उन्होंने कहा कि इस डिजाइन में भारत के तिरंगे झंडे को भी देखा जा सकता है.
अभी तक भारतीय रुपये को संक्षिप्त रूप (abbreviated form) में अंग्रेजी में Rs या Re या फिर INR के जरिए दर्शाया जाता है। नेपाल , पाकिस्तान और श्रीलंका में भी मुद्रा का नाम रुपया ही है। लेकिन दुनिया की प्रमुख मुद्राओं का संक्षिप्त रूप के अलावा एक प्रतीक चिन्ह भी है जैसे अमेरिकी डॉलर को USD कहते हैं और इसका प्रतीक चिह्न $ होता है। चि. डी उदय कुमार साधुवाद के पात्र है .रूपीए की पहचान के लिए यह बहुत ज़रूरी था.मुझे बहुत खुशी हुई .पूरे देशवासीयो को भी खुश होना चाहिए.

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पहले अंडा आया या मुर्गी ?

>> 14 जुलाई, 2010

नवभारत टाइम्स के १४-७-२०१० के अंक पर भी नज़र डालें। शेफील्ड और वारविक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों नें जो दावा किया है वह कितना सच है ?

000पहले अंडा आया या मुर्गी ? यह प्रश्न हजारों वर्षों से लोगों को परेशान करता आया है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इस यक्ष प्रश्न का जवाब ढूंढ़ निकालने का दावा किया है। शेफील्ड और वारविक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक दल ने दावा किया है कि धरती पर अंडे से पहले मुर्गी का जन्म हुआ था। वैज्ञानिकों ने पाया कि ओवोक्लाइडिन नाम का प्रोटीन अंडे के खोल के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने बताया कि यह प्रोटीन मुर्गी के अंडाशय से पैदा होता है इसलिये पहले अंडा आया या मुर्गी अब यह पहेली सुलझ गई है। वैज्ञानिकों ने कहा कि पहले मुर्गी आई और इसके बाद अंडा पैदा हुआ। डेली एक्सप्रेस के मुताबिक रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि प्रोटीन पैदा करने वाली मुर्गियां पहले कैसे आईं। इस दल ने अंडे के खोल को देखने के लिये अत्याधुनिक कंप्यूटर हेक्टर का इस्तेमाल किया। शोध से जुडे़ प्रमुख वैज्ञानिक डॉण् कोलिन फ्रीमैन ने कहा लम्बे समय से यह संदेह बना हुआ था कि अंडा पहले आया लेकिन अब हमारे पास वैज्ञानिक सबूत है जो हमें बताता है कि मुर्गी पहले आई।

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ब्लॉग 4 वार्ता: सावधान! खतरनाक जीवों से,विश्वास का पुल बना ---ब्लाग4वार्ता----ललित शर्मा

ब्लॉग 4 वार्ता: सावधान! खतरनाक जीवों से,विश्वास का पुल बना ---ब्लाग4वार्ता----ललित शर्मा

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भविष्यवक्ता पॉल बाबा

>> 12 जुलाई, 2010


विश्व कप के भविष्यवक्ता पॉल बाबा स्वंय का भविष्य तो बतायें......

फूटबाल के विश्व कप फाईनल में स्पेन ने नीदरलैण्ड को एक गोल से हराकर विश्वकप हासिल कर लिया। फाईनल मैच के साथ ही विश्व भर के खेलप्रेमियों पर चढ़ा फूटबाल का फीवर तो शायद उतर गया होगा लेकिन स्पेन के लोग तो एक साथ होली-दीवाली मना रहे हैं। वैसे भी आक्टोपस पॉल ने स्पेन के जीतने की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। यदि स्पेन हार जाता तो आक्टोपस पॉल की विश्वसनीयता भी खत्म हो जाती। पॉल की भविष्यवाणी को कायम रखने के लिए स्पेन का जीतना बहुत जरूरी हो गया था। दरअसल इस फाईनल मैच में स्पेन से ज्यादा आक्टोपस पॉल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी। एक तरफ आक्टोपस पॉल ने स्पेन के जीतने की भविष्यवाणी की थी तो दूसरी तरफ मणि नाम के तोते ने नीदरलैण्ड के शहनशॉह बनने की घोषणा की थी। इन भविष्यवानियो के चलते विश्व कप फाईनल ‘‘स्पेन बनाम नीदरलैण्ड’’ के बजाय ‘‘पॉल बनाम मणि’’ हो गया था। अनेक लोगों की दिलचस्पी केवल इसी में थी कि किसकी भविष्यवाणी सच हो रही है। लगातार सच भविष्यवाणी करने वाले पॉल की भविष्यवाणी इस बार भी सच होगी अथवा नहीं ? यदि पॉल की भविष्यवाणी सच नहीं निकली तो पॉल का भविष्य क्या होगा ?अंततः स्पेन विश्व चैम्पियन बन ही गया। लेकिन जीता कौन स्पेन या पॉल ? इस जीत का श्रेय स्पेन के खिलाड़ियों की मेहनत को दिया जाय या पॉल को ? दुनिया भर की मीडिया ने पॉल को लेकर जो उत्सुकता पैदा की थी उससे तो यही लगता है कि स्पेन ने अपने खिलाड़ियों के दम पर नहीं बल्कि पॉल की भविष्यवाणी के दम पर विश्वकप जीता है।
अब हमें पॉल के भविष्य की चिन्ता करनी चाहिए क्योंकि स्पेन के जीतते ही उसकी मार्केट वैल्यू बढ़ गई है। भविष्य में कोई भी खिलाड़ी मैच के लिए अभ्यास करने के बजाय पॉल बाबा के शरण में जायेगा। खिलाड़ी की ही क्या बात करें अन्य क्षेत्र का प्रतियोगी भी सफलता के लिए शार्टकट रास्ता ही अपनाएगा। चाहे वह विद्यार्थी हो चाहे राजनेता अथवा कोई आई.ए.एस या आई.पी.एस का परीक्षार्थी क्यों न हो सभी मेहनत करने के बजाय पॉल बाबा की शरण में पड़े रहेगें। भले ही परिणाम स्पेन जैसा मिले अथवा नहीं । उधर जर्मनी में पॉल बाबा के नाम पर काफी आक्रोश देखा जा रहा है, कहीं ऐसा न हो कि आक्टोपस पॉल जर्मनी वालों के आक्रोश का शिकार हो जाय, उसने भविष्यवाणी करके बला मोल ले लिया है। यदि भविष्यवाणी झूठी होती तो कोई पूछता भी नहीं, सच हो गई तो मुसीबतों का जंजाल सामने आ गया है। अब आक्टोपस
यानि पाल बाबा तेरा भविष्य कौन बतायेगा ?

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दिन है सुहाना आज पहली तारीख है

>> 01 जुलाई, 2010

फिल्म पहली तारीख का यह गीत आज भी प्रासंगिक तो है ही साथ ही साथ लोकप्रिय भी है । वर्षो बाद भी आज यह गीत लोगो के जुबान में है। धन्य हो रेडियो सिलोन का जिसने हर महीने की पहली तारीख को सुबह 7:30 बजे इस गीत के प्रसारण की परम्परा डाल रखी है । 40 वर्षो से तो मैं स्वयं सुन रहा हूँ । आधुनिक युग में पहली तारीख का क्या महत्व है उसे इस गीत में बखूबी चित्रण किया गया है । इस गीत में आम आदमी की भावना तथा उसकी दशा का वर्णन किया गया है। विशेष कर निम्न मध्यम आय वर्ग के लोगो के दिल की बात को इस गीत में लिखा गया है । गीत के गायक किशोर कुमार धन्यवाद के पात्र है । दरअसल पुरानी फिल्मो के गीतो मे बोल व लय का पूरा समन्वय होता था । आज के फिल्मी गीतो में वो बात कहां ? पुराने जमाने की फिल्में मनोरंजक एवं ज्ञानवर्धक होती थी उसमे गीतों का बड़ा महत्व था । वर्तमान समय में फिल्मी गीतो का तो बूरा हाल है। आज के फिल्मी गीतों में पाश्चात्य संगीत हावी है , गीतो में न लय है न मिठास । यही कारण है कि कोई भी हिट से हिट गीत 6 माह में लोगों के जेहन से उतर जाता है । जबकि पुराने गीतों के बोल वर्षो बाद भी लोगो के जुबां मे है । आज घड़ी ने जैसे ही पहली तारीख का संकेत दिया बरबस ही इस गीत की याद आ गई । मै पुराना रेडियो श्रोता हूँ इस नाते आल इंडिया ओल्ड लिसनर्स ग्रुप, छत्तीसगढ़ रडियो श्रोता संघ, अहिंसा रेडियो श्रोता संघ तथा आकांक्षा रेडियो श्रोता संघ से जुड़ा हूँ । ये बातें पूर्व पोस्ट में जल्दबाजी के कारण छुट गई थी अतः पोस्ट संपादित कर रहा हूँ .। पढ़ कर आप भी अतीत में खो जायेंगें ।
दिन है सुहाना आज पहली तारीख है


दिन है सुहाना आज पहली तारीख है

खुश है ज़माना आज पहली तारीख है
पहली तारीख अजी पहली तारीख है
बीवी बोली घर ज़रा जल्दी से आना,
जल्दी से आना
शाम को पियाजी हमें सिनेमा दिखाना,
हमें सिनेमा दिखाना
करो ना बहाना हाँ बहाना बहाना करो ना बहाना
आज पहली तारीख है
खुश है ज़माना आज पहली तारीख है
पहली तारीख अजी पहली तारीख ह
किस ने पुकारा रुक गया बाबु
लालाजी की जाँ आज आया है काबू
आया है काबू ओ पैसा ज़रा लाना लाना लाना ओ पैसा ज़रा लाना
आज पहली तारीख है
खुश है ज़माना आज पहली तारीख है
पहली तारीख अजी पहली तारीख ह

बंदा बेकार है क़िसमत की मार है

सब दिन एक है रोज़ ऐतबार है

मुझे ना सुनाना हाँ सुनाना सुनाना

मुझे ना सुनाना आज पहली तारीख है
खुश है ज़माना आज पहली तारीख है
पहली तारीख अजी पहली तारीख है

दफ़्तर के सामने आए मेहमान हैं

बड़े ही शरीफ़ हैं पुराने मेहरबान हैं

अरे जेब को बचाना बचाना बचाना
जेब को बचाना आज पहली तारीख है
खुश है ज़माना आज पहली तारीख है
पहली तारीख अजी पहली तारीख है



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