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सैन्य बलों में ईंधन के बेतहाशा इस्तेमाल का दुष्प्रभाव

>> 20 अक्तूबर, 2011

लंदन में हुई विशेषज्ञों की एक कांफ़्रेंस के अनुसार जलवायु परिवर्तन विश्व भर में स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए “एक बड़ा और गहराता ख़तरा ” है. ब्रितानी सेना के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले संघर्षों के चलते ईंधन जैसी वस्तुओं की क़ीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है. लंदन में हुई कांफ़्रेस के बाद जारी बयान में कहा गया है कि भविष्य में मानवीय त्रासदियां सैनिक संसाधनों पर और दबाव डालेंगी.

सम्मेलन ने सरकारों से ग्रीनहाउस गैसों में कटौती के लक्ष्यों को और महत्वकांक्षी बनाने का आहवान किया है. संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक जलवायु कांफ़्रेंस डेढ़ महीने बाद शुरू होगी. इस बैठक से पहले लंदन में ब्रिटिश मेडिकल एसोसिएशन के मुख्यालय में कई विशेषज्ञों ने एक सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों से जलवायु परिवर्तन पर गंभीर होने की अपील की है.

 
सैन्य बलों में ईंधन के बेतहाशा इस्तेमाल करने का दुष्प्रभाव  :--

0   ईंधन की क़ीमत बढ़ने से ब्रिटेन जैसे देशों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.
0   सैन्य बल दुनिया भर में बड़ी मात्रा में ईंधन का उपभोग करते हैं.
0   जिस समुद्री जहाज़ को 12 ईंच आगे बढ़ाने के लिए एक गैलन तेल लगता हैं. 
0   जलवायु परिवर्तन की वजह से विकासशील देशों में कई दुष्प्रभाव पड़ने की चेतावनी दी
0   इससे कुपोषण बढ़ेगा और कुछ संक्रामक रोगों के और फैलने की भी आशंका है.
0   किस तरह अफ़गानिस्तान में सेना के इस्तेमाल के लिए पहुंचने वाला पेट्रोल दस गुना अधिक मंहगा हो जाता  है क्योंकि इसे पाकिस्तान से सड़क के रास्ते लाया जाता है.

7 टिप्पणियाँ:

Ritu 20 अक्तूबर 2011 को 1:08 am  

ईंधन के प्रयोग के अलावा बाकी चीजों के भी तो दुष्‍प्रभाव झेलने पड़ रहे हैं...बहुत सा उपयोगी धन जो विकास कार्यों मे खर्च हो सकता था सैन्‍य साजो-सामान और हथियारों पर खर्च होता है
पर मजबूरी है सभी जगह होड़ मची है तो इस होड़ से बाहर रहकर खुद को खतरे में भी नहीं डाला जा सकता
अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्रयास गंभीर और त्‍वरित होने चाहिए

हिन्‍दी कॉमेडी- चैटिंग के साइड इफेक्‍ट

प्रवीण पाण्डेय 20 अक्तूबर 2011 को 8:26 am  

विचारोत्तेजक लेख, बचत तो करनी ही होगी।

Swarajya karun 20 अक्तूबर 2011 को 9:35 am  

ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए आभार. हिंसक हथियारों की होड़ और दिशाहीन बेतहाशा दौड़ में ऐसा तो होगा ही. हथियारों पर होने वाले खर्च को कम करते हुए उस धनराशि का इस्तेमाल खेती -किसानी, सिंचाई, पेयजल ,सड़क . शिक्षा . चिकित्सा ,पर्यावरण आदि ज़रूरी सेवाओं की बेहतरी के लिए होना चाहिए आइये !हम सब मिलकर एक शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण दुनिया बनाने का संकल्प लें .

PRAMOD KUMAR 20 अक्तूबर 2011 को 7:54 pm  

वास्तव में ग्लोबल वार्मिंग आज विश्व की सबसे बड़ी और पेचीदा समस्या है। जलवायु परिवर्तन से प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति निर्मित होगी.......जिससे विनाश ही होगा। पेट्रोल, डीजल और अन्य हानिकाकर ईंधन की बजाय सौर उर्जा, पवन उर्जा एवं अन्य प्राकृति ईधनों के इस्तेमाल से ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार कुछ कम हो सकती है।

Arvind Jangid 21 अक्तूबर 2011 को 8:31 am  

रोचक एंव ज्ञानवर्धक लेख आभार. एक बात मुझे समझ में नहीं आती कि यदि विश्व कि सभी सरकारी इनती सचेत हैं तो उन्हें सौर ऊर्जा संयत्रों को और ज्यादा सस्ता करना चाहिए जिससे उर्जा के वैकैल्पिक मार्गों का विकास हो. जो पैसा आफत के विश्लेषण पर लागाते हो उपायों पर लगाओ. आप देखिये कि अभी हमारे यहाँ पर सौर उर्जा कि एक प्लेट का खर्चा लगभग नो हजार से शुरू होता है. एक घर के लिए ऐसे लगभग चार प्लेट चाहिए और ऊपर से दूसरे खर्चे अलग. सरकार को सौर ऊर्जा को आम लोगों कि पहुँच में लाना ही होगा.

डॉ.मीनाक्षी स्वामी 21 अक्तूबर 2011 को 3:17 pm  

जागरुक करने वाली पोस्ट के लिये आभार।

Praveen 22 अक्तूबर 2011 को 1:59 pm  

क्या जलवायु परिवर्तन के लिए हम सभी जिम्मेदार नहीं हैं ?
जानवर जंगलों से निकल कर शहरों की तरफ आ रहें हैं और मनुष्यों का शिकार बन रहे हैं,क्यों ?
पेड़ पौधे कम हो रहे हैं , कंक्रीट के जंगल तैयार हो रहे हैं.
हम औपचारिकता के लिए पेड़ पौधे लगा रहे हैं ...पर उनकी देखभाल...नहीं करते भूल जाते हैं?
वातावरण की सेहत बिगाड़ने में हमारा पूरा योगदान है?

निवेदन है कृपया प्लास्टिक का उपयोग करना स्वयं से बंद करें ...
इससे ओजोन परत को रहत मिलेगी तथा हमारी धरती प्रदूषित नहीं होगी.

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