Blogger द्वारा संचालित.
ग्राम चौपाल में आपका स्वागत है * * * * नशा हे ख़राब झन पीहू शराब * * * * जल है तो कल है * * * * स्वच्छता, समानता, सदभाव, स्वालंबन एवं समृद्धि की ओर बढ़ता समाज * * * * ग्राम चौपाल में आपका स्वागत है

पांडव नृत्य और जीवन का चक्रव्यूह

>> 04 दिसंबर, 2011

द्रोणाचार्य का चक्रव्यूह 
त्तराखंड में इन दिनों कड़ाके की ठण्ड पर रही है ,यहाँ का  न्यूनतम तापमान 4  डिग्री सेंटीग्रेट हो गया है .यदि तापमान गिरने का सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो 8-10  दिनों में शून्य डिग्री तक पहुँच जायेगा . यहाँ रात बहुत बड़ी तथा दिन बहुत छोटा है . सुबह 8 बजे के बाद सूर्योदय होता है तथा शाम 5 बजे सूर्यास्त होता है . सुबह 11 बजे तक लोग रजाई में जकड़े रहते है . कार्य की दृष्टि से सुबह 11 बजे से 3 बजे तक ही समय रहता है . यानी केवल 4 घंटे का दिन होता है .

पर्वतीय क्षेत्रों के सीढ़ीदार खेत 
वैसे भी इन दिनों उत्तराखंड के लोग कमोबेस खाली ही  रहते है . रुद्रप्रयाग जहाँ मै पिछले एक सप्ताह से रुका हूँ पूरा इलाका तीर्थाटन व पर्यटन क्षेत्र है .यहाँ से केदारनाथ लगभग 100  कि.मी. , बद्रीनाथ-180 कि.मी. , कर्णप्रयाग-35 कि.मी., जोशीमठ-125 कि.मी.एवं गुप्तकाशी-40 कि.मी. दूरी पर है .केदारनाथ और बद्रीनाथ के पट मई में खुलते है और नवंबर में बंद हो जाते है . पट खुलते ही श्रद्धालूओं व सैलानियों के आने जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है .इस मौसम में  तो बिरले लोग ही इधर आते है . अधिकांश लोगों की आजीविका इसी से जुड़ी है . इसके अलावा यहाँ आजीविका का मुख्य साधन कृषि है . धान , दलहन व तिलहन के फसल की कटाई हो चुकी है . किसानों ने गेहूं की बुवाई कर ली है , किन्ही किन्हीं खेतों में गेहूं के पौधें २-3 इंच ऊग आये है . इधर के खेत पहाड़ों के ऊपर छोटे छोटे व सीढ़ीनुमा होते है . सिचाई के साधन नहीं के बराबर है ,बरसात के अलावा पहाड़ों की ऊपरी सतह से झरते हुए जल के भरोसे ही रहना पड़ता है .  यह विडम्बना ही है कि इस इलाके में जीवनदायिनी गंगा की अनेक सहायक नदियाँ बारहों महीनें बहती है फिर भी यहाँ की खेती प्यासी है , किसानों के खेत सूखे है . यदि नदियों के जल का उदवहन कर खेतों तक पहुँचाया जाय तो कृषि के क्षेत्र में काफी उन्नति हो सकती है . बताया जा रहा है कि प्रदेश की खंडूरी सरकार ने लिफ्ट इरीगेशन की कुछ परियोजनाएं स्वीकृत की है ,  कुछ के काम भी शुरू हो गए है . वैसे नदी के जल से अनेक जल-विद्युत् परियोजनाएं संचालित हो रही है . जिसका विरोध गंगा बचाओ अभियान वाले कर रहें है हालाँकि इस इलाके में नदी के जल-प्रदुषण की बड़ी समस्या नहीं है .

 वैवाहिक कार्यक्रमों का जोर

जयमाला 
आजकल लोगों के पास काम कम है . शायद इसीलिये इस मौसम में शादियों का रिवाज है ,अमूमन शादियाँ दिन में ही होती है . चारोँ तरफ शादियों की धूम मची है . हमें भी एक कार्यकर्ता की लड़की की शादी में यहाँ के पदाधिकारियों के साथ शामिल होने का सौभाग्य मिला . कार्यालय से लगभग 1 कि.मी. ऊपर पहाड़ पर पैदल चलकर जाना पड़ा . स्थानीय लोग तो पहाड़ पर आसानी से चढ़ गए लेकिन हमारी तो स्वांस ही फुल गई , दो बार मेरे कारण पूरे काफिले को रूकना पड़ा . विवाह स्थल पर पहुंचें तो बारात पहले ही आ चुकी थी . मंच पर वर-वधु जयमाला हाथ में लिए संकेत का इंतजार कर रहे थे . जैसे ही वीडियोंग्राफर और फोटोग्राफर अपनी पोजीशन में आये दोनों ने एक दूसरे के गले में जयमाला डाल दी . फिर शुरू हुआ बधाई देने का सिलसिला . उसी समय लड़की की माँ ने जो भाजपा की कार्यकर्ता है हम सबको एक एक लिफाफा दिया . उसमें 10 रुपये का एक नया नोट था .मैंने उस लिफाफे में एक सौ का नोट डाला और वापिस कर दिया . दोपहर का भोजन भी वहीं करके वापस आ गए.

 पांडव-नृत्य

चक्रव्यूह की ओर रथ बढ़ते अभिमन्यु
गाँव गाँव में इन दिनों पांडव नृत्य का जोर है . कड़कड़ाती ठण्ड के बावजूद यह कार्यक्रम लगातार 20 - 25 दिनों  तक रात-दिन चलता है . अंतिम दिनों में पांडवों के स्वर्गारोहण का मंचन किया जाता है . रुद्रप्रयाग से लगभग 20 कि.मी. दूरी पर ग्राम " नारी " के पांडव नृत्य कार्यक्रम में हमें भी जाने का अवसर मिला ,यह गाँव केदार नाथ विधान सभा क्षेत्र में है . मेरे साथ जिलाध्यक्ष श्री वाचस्पति सेमवाल ,क्षेत्रीय विधायक श्रीमती आशा नौटियाल एवं अन्य  पदाधिकारी भी थे. रुद्रप्रयाग से सड़क के रास्ते हम लोग दोपहर 12  बजे सतेराखाल पहुंचें जहाँ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने ढोल मंजिरें के साथ स्वागत किया . वहां से लगभग 1 कि.मी.  पैदल खेतों के मेड़ों और पगडंडियों से होकर नीचे गए जहाँ एक खेत को समतल करके चक्रव्यूह बनाया गया था .  चारों तरफ लोगों का हुजूम लगा था . लोग दूर दूर से पैदल चलकर आये थे . एक किनारे में कुछ छोटी छोटी दुकाने लगी थी .पूरे मेले का दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा था . स्वागत की रस्म अदायगी के बाद हम लोग एक स्थान पर बैठ गए . सबसे पहले सावधान सावधान की हुंकार भरते हुए कौरवों दल का आगमन हुआ . कौरव दल का नेतृत्व गुरु द्रोणाचार्य कर रहे थे . द्रोणाचार्य ने एक एक करके सभी महारथियों को चक्रव्यूह के एक एक द्वार का जिम्मा दिया . कुछ ही देर में अभिमन्यु अपने साथियों के साथ पहुचे , अभिमन्यु को एक खाट में बैठा कर लाया गया . लगभग 10 - 12 नवजवान खाट को चारों तरफ से उठाये हुए थे . जैसे ही वे मंच के पास आये अभिमन्यु ने चार फीट उचाई से छलांग लगा कर चक्रव्यूह के प्रथम द्वार पर पहरा दे रहे जयद्रथ को ललकारा . जयद्रथ भी कहाँ चुकने वाला था उसने भी अपने अन्य साथियों को सावधान होने का संकेत दिया और अभिमन्यु से जा भिड़ा . दोनों तरफ से डायलाग हुए . अभिमन्यु जब कोई डायलाग बोलता था तब वहां उपस्थित 5 हजार लोग ताली बजाकर स्वागत करते थे .दोनों में पहले वाक-युद्ध फिर तीर-युद्ध उसके बाद गदा-युद्ध हुआ. अंत में मल-युद्ध में जयद्रथ मूर्छित हो गया .अभिमन्यु ने पहली फतह हासिल करने के बाद दूसरे द्वार की ओर रूखसत किया और हम लोग पास ही में स्थित एक प्राचीन मंदिर में माँ चंडी का दर्शन करके बिदा हो गए .


पांडव नृत्य की ओर बढ़ता कारवां

जयद्रथ और अभिमन्यु के युद्ध को मंच से निहारते अतिथि
गाँव के गणमान्य नागरिक अतिथियों का स्वागत करते हुए

www.ashokbajajcg.com

3 टिप्पणियाँ:

PRAMOD KUMAR 5 दिसंबर 2011 को 6:47 pm  

आलेख बहुत ज्ञानवर्द्धक लगा । इसमें उत्तराखंड की संस्कृति, परम्परायें, कृषि एवं पर्यटन आदि की रोचक तथा सचित्र वर्णन पढ़ने को मिला । इतने बढ़िया आलेख के लिए धन्यवाद.......................!

ब्लॉ.ललित शर्मा 6 दिसंबर 2011 को 11:06 am  

बढिया यात्रा संस्मरण एवं वि्स्तृत जानकारी, ठंड से बचना जरुरी है। अब कुछ पैदल चलने का अभ्यास कीजिए।

आशा 6 दिसंबर 2011 को 7:12 pm  

बढ़िया और जानकारी देती रचना |रोचक संस्मरण
आशा

एक टिप्पणी भेजें

About This Blog

  © Blogger template Webnolia by Ourblogtemplates.com 2009

Back to TOP