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बिना ड्राइवर की कार

>> 30 सितंबर, 2011

फिल्मों में खुद-ब-खुद चलने वाली कारें तो बहुत देखी हैं, लेकिन अगर सच में ये बन जाएं तो ड्राइवर ढूंढने की चिंता खत्म हो जाएगी। कार अपने आप चलेगी और आप आराम से बैठ कर अपनी नींद पूरी कर सकेंगे।


कारों में महारत हासिल करने वाली जर्मन कंपनी बीएमडब्ल्यू इस दिशा में काम कर रही है. म्यूनिख में प्रोजेक्ट लीडर निको केम्पशन का कहना है कि भविष्य में सभी कारें ऑटो पायलट पर चला करेंगी. रडार, लेजर और कैमरों की मदद से कारें अपना रास्ता खुद ही ढूंढ लेंगी. हालांकि इस के लिए इंतजार करना होगा, "इस तरह की तकनीक को कारों में लाना, जिस से वे रास्ता अपने आप ही ढूंढ कर चलती रहें, इसमें तो अभी काफी समय लगेगा."

 फिलहाल निको केम्पशन 'ऑप्टिमाइजिंग असिस्टेंस सिस्टम' पर काम कर रहे हैं जो कार चलाने में कई तरह से मददगार साबित हो सकता है। मौजूदा आधुनिक कारों में पार्किंग असिस्टेंट की सुविधा आम हो गई है, जिनमें आगे और पीछे सेंसर लगे होते हैं। केवल एक बटन दबाने से कार पार्किंग के लिए तैयार हो जाती है और अपने लिए जगह खोज लेती है। ड्राइवर को केवल एक्सलरेटर और ब्रेक का ध्यान रखना होता है, और छोटी से छोटी जगह में इसकी मदद से कार पार्क करना संभव हो पाता है। इस 'पार्क-असिस्ट' की कीमत तीस से साठ हजार रुपये के बीच है।

जर्मनी की तकनीकी परीक्षण संस्था कुएस के हांस गेओर्ग मार्मिट की सलाह है कि इस तरह की तकनीक में और निवेश करना चाहिए, 'कार पार्क करते वक्त गाड़ी को अगर जरा सी भी टक्कर लग जाए तो आपको अपनी कार की मरम्मत का भी खर्चा उठाना पड़ता है और जिसके साथ टक्कर हुई है उसका भी।'

बीएमडब्यू और फोल्क्सवागेन कंपनियों में इस बात पर शोध चल रहा है कि ड्राइवर के कार में बैठे बिना ही उसे किस तरह पार्क किया जा सके। इस तरह के सिस्टम से कार को ऐसी तंग जगह पर पार्क करने में मदद मिलेगी जहां पार्क करने के बाद ड्राइवर कार से बाहर नहीं निकल सकता। कार को पार्किंग से निकालने के लिए आपको बस रिमोट कंट्रोल का बटन दबाना है, कार का इंजन अपने आप शुरू हो जाएगा और कार खुद ही बाहर निकल आएगी।

हालांकि दोनों ही कंपनियां अभी भी यह बताते हुए हिचकिचा रही हैं कि इस तरह का सिस्टम बाजार में कब उपलब्ध होगा। लोगों के लिए ऐसे सिस्टम बेहद रोमांचक तो हैं, लेकिन साथ ही इस बात का डर भी है कि इस से कार पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहेगा।

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नवरात्रि पर्व -- मैं भी तो इक माँ हूँ माता ...

>> 29 सितंबर, 2011


            मैं भी इक माँ हूँ माता .........  

नवरात्रि पर्व की आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !




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भारत में महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव ?

>> 27 सितंबर, 2011

महिलाओं के लिए आइसलैंड बेहतरीन :  भारत 141 वें स्थान पर
 
 
भारत में महिलाओं के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया जाता. 165 देशों में महिलाओं की स्थिति को लेकर न्यूजवीक पत्रिका ने एक सर्वे किया है. इसमें भारत को काफी नीचे यानी 141वें स्थान पर रखा गया है. दिग्गज पत्रिका न्यूजवीक ने महिलाओं के लिए 'अच्छे और खराब स्थानों' को लेकर सर्वे किया. सर्वे में यह देखा गया कि किस देश में महिलाओं को कैसे अधिकार दिए गए हैं और वहां महिलाओं के जीवन का स्तर कैसा है. आइसलैंड को महिलाओं के लिए सबसे उपयुक्त देश बताया गया है. कनाडा, डेनमार्क और फिनलैंड उसके बाद आते हैं. 

धरातल में भारत

एशियाई देशों में फिलीपींस एक मात्र ऐसा देश है जो टॉप 20 में है. भारत को काफी नीचे रखा गया हैं. 165 देशों की सूची में भारत 141वें स्थान पर हैं. बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, श्रीलंका और चीन जैसे देश महिला अधिकारों और उनकी देखभाल के मामले में भारत से बेहतर आंके गए हैं. अमेरिका में यूनिवर्सल सोसाइटी ऑफ हिंदूइज्म के अध्यक्ष राजन जेद के मुताबिक भारत आर्थिक रूप से वैश्विक ताकत बनने की राह पर है लेकिन अधिकतर महिलाएं इस बदलाव से अछूती हैं. भारत में महिलाओं को अब भी बराबरी का हक नहीं मिल रहा है. उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है. जेद कहते हैं, "हमें भारत में अपनी महिलाओं को सशक्त करने की जरूरत है. कानून के तहत उनके साथ बेहतर व्यवहार होना चाहिए. उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीति में आने का मौका देना होगा. कामकाज के क्षेत्र में भी उन्हें ज्यादा मौके दिए जाने चाहिए."

दुनिया भर में महिलाओं की स्थिति को लेकर हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की भी एक रिपोर्ट आई. उस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं है. भारत में अब भी 39 फीसदी महिलाएं और पुरुष पत्नी की पिटाई को सही ठहराते हैं. शारीरिक  हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं में से सिर्फ 35 फीसदी ही पुलिस में  रिपोर्ट दर्ज कराती हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक प्रसव के दौरान होने वाली मौतों को रोकने के लिए भारत कदम उठा रहा है लेकिन वह वादों से काफी पीछे है.

समस्या का एक नमूना

भारत में आम लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं. गांवों और छोटे शहरों में प्रसव के दौरान महिलाएं सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहती हैं. लेकिन कई जगहों पर अस्पताल नाम की चीज ही नहीं है. ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों, कमरों और अत्याधुनिक मशीनों की कमी है. ऑपरेशन थिएटर में पुराने पंखे दिखाई पड़ना आम बात है. ऑक्सीजन के जंग लगे सिलेंडर, जंग खाई हुई मशीनें हर किसी की निगाह में आ ही जाती हैं. कुछ गैर सरकारी संगठन कहते हैं कि सरकार सरकारी अस्पतालों के प्रति गंभीर नहीं है.

सरकारी अस्पतालों में मैनेजमेंट नाम की कोई चीज नहीं है. डॉक्टरों को इलाज भी करना है और अस्पताल का ध्यान भी रखना है. मशीन खराब होने जाने पर उन्हें अर्जी लिखनी है, अर्जी जिला प्रशासन को जाएगी, फिर वहां से आगे जाएगी. यह एक अंतहीन सी प्रक्रिया है. किसी को पता नहीं कि नए उपकरण कब आएंगे. वहीं निजी अस्पतालों में डॉक्टर सिर्फ इलाज करते हैं, बाकी काम मैनेजमेंट संभालता है. अस्पताल की सफाई, मशीनों की देखभाल और काम काज को व्यवस्थित करने का काम प्रबंधन करता है. यह कोई जादुई नुस्खा नहीं है जो सिर्फ निजी अस्पतालों पर ही लागू होता है. कहीं न कहीं यह बात सच है कि भारत में सरकारी अस्पतालों की संख्या बढ़ाने और उन्हें बेहतर बनाने से ज्यादा ध्यान निजी अस्पताल की फौज खड़ी करने में लगाया गया है.

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देश की आत्‍मा ही उसकी मूल संस्‍कृति है

>> 24 सितंबर, 2011

पं. दीनदयाल उपाध्‍याय की जयंती 25 सितम्‍बर पर विशेष
 

पं.दीनदयाल उपाध्याय 


                पं.दीनदयाल उपाध्याय एक महान राष्ट्र चिन्तक एवं एकात्ममानव दर्शन के प्रणेता थे. उन्होनें मानव के शरीर को आधार बना कर राष्ट्र के समग्र विकास की परिकल्पना की. उन्होनें कहा कि मानव के चार प्रत्यय है पहला मानव का शरीर , दूसरा मानव  का मन , तीसरा मानव की बुद्धि और चौथा मानव की आत्मा. ये चारोँ पुष्ट होंगें तभी मानव का समग्र विकास माना जायेगा. इनमें से किसी एक में थोड़ी भी गड़बड़ है तो मनुष्य का विकास अधूरा है. जैसे यदि किसी के शरीर में कष्ट है और उसे 56 भोग दिया जाय तो उसकी खाने में रूचि नहीं होगी. यदि  कोई व्यक्ति बहुत ही स्वादिस्ट भोजन कर रहा है  उसी  समय यदि कोई अप्रिय समाचार मिल जाय तो उसका मन खिन्न हो जायेगा. भोजन तो समाचार मिलने के पूर्व जैसा स्वादिस्ट था अब भी वैसा ही स्वादिस्ट है लेकिन अप्रिय समाचार से व्यक्ति का मन खिन्न हो गया इसीलिये उसके लिए भोजन क्लिष्ट हो गया. यानी भोजन करते वक्त "आत्मा" को जो सुख मिल रहा था वह मन के दुखी होने से समाप्त हो गया. पं. दीनदयाल जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर,मन, बुद्धि और आत्मा ये चारोँ ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है , बुद्धि हाथ को निर्देशित करती है कि तब हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहुँच जाता है और  कांटें को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है. सामान्यतः मनुष्य  शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन  चारोँ की चिंता करता है. मानव की इसी स्वाभाविक  प्रवृति को पं. दीनदयाल उपाध्याय ने  एकात्म मानव वाद की संज्ञा दी. उन्होंने  मनुष्य की इस स्वाभाविक प्रवृति को राष्ट्र के परिपेक्ष्य प्रतिपादित करते हुए कहा कि राष्ट्र की स्वाभाविक प्रवृति उसकी संस्कृति है. देश को किस मार्ग पर चलना चाहिए इस पर चिंतकों में मतभेद हैं कुछ  अर्थवादी ,कुछ राजनीतिवादी तथा कुछ मतवादी दृष्टिकोण के है, इनमें से अलग हट कर पं. दीनदयाल उपाध्याय ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर जोर दिया उन्होनें कहा कि संस्कृति-प्रधान जीवन की यह विशेषता है कि इसमें जीवन के मौलिक तत्वों पर तो जोर दिया जाता है पर शेष बाह्य बातों के संबंध में प्रत्येक को स्वतंत्रता रहती है.इसके अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रत्येक क्षेत्र में विकास होता है. संस्कृति किसी काल विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के बन्धन से जकड़ी हुई नहीं है, अपितु यह तो स्वतंत्र एवं विकासशील जीवन की मौलिक प्रवृत्ति है. इस संस्कृति को ही हमारे देश में धर्म कहा गया है. जब हम कहतें है कि भारतवर्ष धर्म-प्रधान देश है तो इसका अर्थ मज़हब, मत या रिलीजन नहीं, अपितु  यह संस्कृति ही है.
                पं.दीनदयाल उपाध्याय की मान्यता थी  कि भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा. भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी. विश्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते हैं तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्त्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते हैं, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं ; उसमें तो शायद हमको  ही उल्टे कुछ सीखना पड़े. अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग अधिकार के स्थान पर कर्त्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है. इनके साथ ही हम विश्व में गौरव के साथ खड़े हो सकते हैं.
                        भारतीय जीवन का प्रमुख तत्व उसकी संस्कृति अथवा धर्म होने के कारण उसके इतिहास में भी जो संघर्ष हुये हैं, वे अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिए ही हुए हैं तथा इसी के द्वारा हमने विश्व में ख्याति भी प्राप्त की है. हमने बड़े-बड़े साम्राज्यों के निर्माण को महत्व न देकर अपने सांस्कृतिक जीवन को पराभूत नहीं होने दिया . यदि हम अपने मध्ययुग का इतिहास देखें तो हमारा वास्तविक युध्द अपनी संस्कृति के रक्षार्थ ही हुआ है. उसका राजनीतिक स्वरूप यदि कभी प्रकट भी हुआ तो उस संस्कृति की रक्षा के निमित्त ही . राणा प्रताप तथा राजपूतों का युध्द केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नहीं था अपितु धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ही था. छत्रपति शिवाजी ने अपनी स्वतंत्र राज्य की स्थापना गौ-ब्राह्मण प्रतिपालन के लिए ही की. सिक्ख-गुरुओं ने समस्त युध्द-कर्म धर्म की रक्षा के लिए ही किए . इन सबका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि राजनीति का कोई महत्व नहीं था अथवा राजनीतिक गुलामी हमने सहर्ष स्वीकार कर ली; बल्कि हमने  राजनीति को हमने जीवन में केवल सुख का कारण मात्र माना है, जबकि संस्कृति ही हमारा जीवन है.
                  आज भी भारत में प्रमुख समस्या सांस्कृतिक ही है वह भी आज दो प्रकार से उपस्थित है, प्रथम तो संस्कृति को ही भारतीय जीवन का प्रथम तत्व  मानना तथा दूसरा इसे मान लेने पर उस संस्कृति का रूप कौन सा हो विचार के लिए. यद्यपि यह समस्या दो प्रकार की मालूम होती है, किन्तु वास्तव में है एक ही. क्योंकि एक बार संस्कृति को जीवन का प्रमुख एवं आवश्यक तत्व मान लेने पर उसके स्वरूप के सम्बन्ध में झगड़ा नहीं रहता, न उसके सम्बन्ध में किसी प्रकार का मतभेद ही उत्पन्न होता है. यह मतभेद तो तब उत्पन्न होता है जब अन्य तत्वों को प्रधानता देकर संस्कृति को उसके अनुरूप उन ढांचों में ढंकने का प्रयत्न किया जाता है.
            पं. दीनदयाल उपाध्‍याय ने संस्‍कृति को प्रधानता देते हुये यह सिद्धांत  प्रतिपादित किया कि देश की संस्‍कृति ही देश की आत्‍मा है तथा यह एकात्‍म होती है. इसकी मैलिकता सदैव अक्षुण्‍ण रहती है.
पं. दीनदयाल जयंती के कार्यक्रम की झलकियाँ

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खुश हो जाइये क्योंकि अब आप अमीर हैं

>> 22 सितंबर, 2011



एक मजे की बात सुनो ........

प यदि भारत के किसी शहर में रहते हैं और आपका प्रतिदिन का खर्चा 32 रु. या उससे अधिक है तो आप अमीर हैं . यदि आप भारत के किसी गाँव में रहते हैं  और आपका प्रतिदिन का खर्चा 26 रु. या उससे अधिक है तो आप गरीब कदापि नहीं हैं  .जी हाँ योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दाखिल कर कहा है कि शहरी क्षेत्रों में 965 रुपए प्रति माह और ग्रामीण क्षेत्रों में 781 रुपए प्रति माह कमाने वाले व्यक्ति को हरगिज  ग़रीब नहीं कहा जा सकता. इस स्थिति में आप  सरकार की उन कल्याणकारी योजनाओं और सुविधाओं के पात्र नहीं है जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए बनाई गई है .
 
नए मापदंड के मुताबिक़ शहर मे रहने वाला पांच सदस्यों का परिवार अगर महीने में 4,824 रुपए कमाता है, तो उसे कल्याणकारी योजनाओं के लिए योग्य नहीं कहा जा सकता. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले 5 सदस्यीय  परिवार के लिए मासिक 3,905 रुपए की कमाई उन्हें बी.पी.एल. से ऊपर यानी ए.पी.एल. की श्रेणी में नाम दर्ज करने के लिए काफी है . लिहाज़ा उन्हें  केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ़ से ग़रीबों के लिए चलाए जाने वाली योजनाओं से महरूम रहना होगा .

अब सवाल यह उठता है कि इतनी कमाई क्या एक परिवार की खाद्यान , आवास , चिकित्सा , शैक्षणिक आवश्यकता तथा अन्य पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है . भीषण बढ़ती महंगाई के युग में योजना आयोग ने बी.पी.एल. का जो नया पैमाना केंद्र सरकार की सहमति से प्रस्तुत किया है वह अत्यंत ही हास्यास्पद है तथा गरीबी का सीधा मजाक है . पिछले कुछ वर्षों से मध्यम वर्ग तथा निम्न मध्यम वर्ग के लोग आर्थिक तंगी से बेहाल है , इनमें से कुछ लोग अपना नाम बी.पी.एल. में जुड़वा कर अपना किसी प्रकार गुजारा कर रहें है यदि योजना आयोग की सिफारिश ज्यों की त्यों लागू हो जाती है तो इन पर पहाड़ टूट जायेगा .



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ब्लागिंग का भविष्य उज्जवल है

>> 20 सितंबर, 2011

हिंदी के सुप्रसिद्ध ब्लागर श्री गिरीश बिल्लोरे जबलपुर  द्वारा http://bambuser.com के लिए दिनांक 19 सितंबर 2011 को वीडियो चेटिंग के माध्यम से  इंटरव्यू लिया गया . इसमें श्री बिल्लोरे की आवाज तो साफ आ रही है पर मेरी आवाज इको होने के कारण स्पष्ट नहीं है . इस साक्षात्कार में  ब्लागिंग ,पत्रकारिता ,पर्यावरण , कुपोषण एवं भ्रूण हत्या जैसे ज्वलंत मुद्दों पर लंबी चर्चा हुई . 

*  ब्लागिंग का भविष्य उज्जवल है .
*  राष्ट्रीय ब्लागर मीट अब रायपुर में .
*  उर्जा का अपव्यय न करें , इसे भावी पीढ़ी के लिए बचाए .
          
सुनिए यू-ट्यूब पर .....


      

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ब्लागिंग के क्षेत्र में नया धमाका

>> 18 सितंबर, 2011

  नए एग्रीगेटर : ब्लागललित का उदय
पं. ललित शर्मा
ब्लागरों को काफी दिनों से एक सशक्त  एग्रीगेटर की कमी खल रही थी , चिट्ठाजगत के विसर्जन  के बाद ब्लागरों में निराशा की भावना घर कर गई थी . फलस्वरूप अनेक ब्लॉग बंद हो गए . अधिकांश ब्लागर  फेसबुक के  भीड़ भरे स्टाल के हिस्से हो गए.ब्लागिंग की इस मंडी में मन्दी छा गई है  यानी नए ब्लागरों की आवक कम हो गई है .छत्तीसगढ़ के ब्लागरों के लिए छत्तीसगढ़ ब्लागर्स चौपाल तो है लेकिन अन्य प्रान्त के ब्लागरों को इसकी कमी का एहसास था .  इस स्थिति में छत्तीसगढ़ के तेजतर्रार ब्लागर पं. ललित शर्मा ने  काफी मेहनत और मशक्कत के बाद आज से ब्लागिंग की दुनिया में नया एग्रीगेटर प्रारंभ किया है .इस एग्रीगेटर का नाम उन्होंने रखा है- ब्लागललित (http://blogabhanpur.blogspot.com). इसमें लगभग 500 ब्लाग पोस्ट प्रदर्शित हो रहे है . यह  एग्रीगेटर  ब्लाग जगत में नया धमाका  है तथा आने वाले समय में यह मील का पत्थर साबित होगा . इससे नए पुराने सभी ब्लागरों को प्रोत्साहन मिलेगा . भाई ललित जी को उनके इस सराहनीय प्रयास के लिए साधुवाद तथा सभी ब्लागरों को बधाई .

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ब्रिटिश संसद में जम्मू-कश्मीर पर निरर्थक बहस

>> 16 सितंबर, 2011


ब्रिटेन में  कंजरवेटिव पार्टी के सांसद स्टीव बेकर के नेतृत्व में कश्मीर समर्थक अनेक सांसदों ने जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार हनन के कथित उल्लंघन पर  निचले सदन हाउस ऑफ कामंस में बहस कराने की मांग की है.  एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट को मुख्य आधार बना कर इन सांसदों ने हाउस ऑफ कामंस में यह मुद्दा उछाला है . 

कश्मीर में पृथकतावाद के समर्थक  ब्रिटेन के इन  सांसदों की  यह हरकत भारत के आतंरिक मामले में  सीधा हस्तक्षेप है . भारत एक लोकतांत्रिक देश है तथा यहां विधि का  शासन स्थापित है अतः  भारत सरकार को इस पर कड़ा एतराज करना चाहिए . 

लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के नेतृत्व में हाल ही  में भारत का एक संसदीय प्रतिनिधिमंडल लंदन में वेस्टमिंस्टर गया था . शिष्टमंडल को  ब्रिटिश संसद में लगे विश्व के नक्शे को  देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ . ब्रिटिश संसद में लगे नक्शे में  अरुणाचल प्रदेश को चीन तथा  कश्मीर के एक हिस्से को पाकिस्तान में प्रदर्शित किया  गया है .

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ये वो नन्हें फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे....

>> 13 सितंबर, 2011

                    


" इनको किसी से बैर नहीं, इनके लिए कोई गैर नहीं "

 

जन्म के वक्त पपी का वजन 500 ग्राम से लेकर सात किलो तक हो सकता है. ऐसा नहीं है कि जन्म के वक्त उनका जो रंग है, वही हमेशा रहे. हो सकता है बाद में वह बदल जाए.

चाहे बच्चे ही क्यों न हों लेकिन हैं तो बाघ के. दहाड़ लगाने पर अच्छे अच्छों के पसीने छूट जाते हैं. एक किलो का बाघ का बच्चा बड़ा होकर 300 किलो तक का हो सकता है.
पैदाइश के वक्त आम तौर पर हाथी का वजह 105 किलो होता है. हाथी काले भी होते हैं, सफेद भी. लेकिन उनकी सबसे ज्यादा पूछ उनके दांतों की वजह से होती है.

  

बिल्लियां भले ही पालतू हों और खतरनाक न दिखें लेकिन उन्हें शेर की मौसी कहा जाता है. पैदा होने के बाद उन्हें पूरी तरह से विकास करने में करीब दो महीने लगते हैं.

सोचिए शेर के बच्चे जब छोटे हों तो एक टोकरी में चार बच्चों को भी रखा जा सकता है. तब उनका वजह भी सिर्फ एक किलो होता है लेकिन जब बड़े हो जाएं, तो 250 किलो तक के हो सकते हैं.
कोअला प्रजाति का यह बच्चा दिखने में पांडा से मिलता जुलता है लेकिन इसकी परवरिश कंगारुओं तरह होती है. लॉस एजेंलिस के जू में पैदा हुआ किरही छह महीने तक मां की थैली में रहा.
समुद्री ही सही, शेर तो ये भी हैं. जन्म के समय समुद्री शेर यानी सील का वजन आम तौर पर 10 किलो के आस पास होता है. कुछ सील मनुष्यों के दोस्त बन जाते हैं.
सफेद बर्फ पर लोटते ये बर्फीले भालू भले ही एक जैसे दिख रहे हों लेकिन नर भालू बड़ा होकर कोई 700 किलो का हो जाएगा, जबकि मादा भालू का वज़न उससे आधा ही रह जाएगा.
यंट पांडा जन्म के समय सिर्फ 100 या 200 ग्राम का होता है और तब कोई सोच भी नहीं सकता कि बड़ा होकर यह 150 किलोग्राम का बन सकता है. अमेरिकी जू में चहलकदमी करता एक पांडा.
कंगारू का बच्चा जन्म के बाद महीनों मां की थैली में रहता है. इस दौरान उसका विकास होता रहता है. करीब 235 दिन तक वहां रहने के बाद वह आखिरी बार मां की थैली को छोड़ता है.
शेर की सवारी करने के लिए शेर का बच्चा होना जरूरी है. लेकिन अगर आप बंदर हैं और आपका नाम गोल्डन लॉयन है, तो भी आप यह सवारी कर सकते हैं
फोटो - साभार डायचे वेले हिंदी

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कैंसर , क्रॉकस और कश्मीर का केशर



वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड के ताजे रिपोर्ट के अनुसार यदि रहन सहन का तरीका स्वस्थ हो और अच्छा खाना खाया जाए तो दुनिया भर में हर साल 28 लाख लोगों को कैंसर का शिकार होने से रोका जा सकता है.दूसरी ओर  इंग्लैंड के वैज्ञानिकों का दावा है कि उन्होंने एक स्थानीय फूल से निकाले गए तत्वों के इस्तेमाल का एक तरीका खोज निकाला है, जिससे कैंसर की कोशिकाओं को खत्म करने में मदद मिलती है.
पूरी दुनिया में पिछले एक दशक के भीतर ही कैंसर के मरीजों की तादाद हर साल करीब 20 फीसदी बढ़ने लगी है. हर साल 1 करोड 20 लाख नए लोग कैंसर के शिकार हो रहे हैं. दिल, फेफड़े और मधुमेह जैसी बीमारियों की तरह ही ये भी दुनिया के लिए स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक बन गई है.  

दो हफ्ते पहले संयुक्त राष्ट्र के गैर संक्रामक रोगों पर बुलाए गए सम्मेलन में इस बारे में एक रिपोर्ट जारी की गई. कैंसर रिसर्च फंड ने इस मौके पर कहा कि राजनेताओं के सामने यह एक बड़ा मौका है जब वो कैंसर और खराब जीवनशैली के कारण होने वाली दूसरी बीमारियों को रोकने के लिए कदम उठा सकते हैं. दुनिया भर के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी रखने वालों की मानें तो गैर संक्रामक रोगों से होने वाली मौतों में करीब एक तिहाई की वजह कैंसर है और उसे रोका जा सकता है. जानकारों के मुताबिक शराब पीने में कमी, अच्छा भोजन, धूम्रपान पर रोक और शारीरिक गतिविधियों में इजाफा कर के इस पर लगाम लगाई जा सकती है.
कैंसर के उपचार के लिए लगातार शोध हो रहे है , लंबे शोध के बाद लंदन के वैज्ञानिकों ने  दावा किया है कि उन्होंने एक स्थानीय फूल से निकाले गए तत्वों के इस्तेमाल का एक तरीका खोज निकाला है, जिससे कैंसर की कोशिकाओं को खत्म करने में मदद मिलती है. क्रॉकस  फूल से उपचार की बात सदियों से कही जाती है और प्राचीन मिश्र  के कई मेडिकल रिकॉर्ड्स में भी इसका जिक्र  है . अब ब्रिटेन के एक शोध दल ने इस फूल का स्त्रोत के रूप में इस्तेमाल करके एक दवा बनाई है. ये दवा कैंसर वाले ट्यूमर से निकलने वाले एक रसायन से ही सक्रिय  होती है. एक लैब में चूहों पर हुए प्रयोग के दौरान आधे से ज्यादा  चूहों पर दवा की एक ही ख़ुराक का प्रभावशाली असर पडा. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये कोई चमत्कारिक दवा नहीं है और वे इसका परीक्षण दो साल के अंदर शुरू करेंगे. ब्रैडफर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्होंने क्रॉकस फूल के जहरीलेपन को इस रूप में विकसित किया है, जिससे वे कैंसर की कोशिकाओं का खात्मा कर सकें. ब्रैडफर्ड में कैंसर चिकित्साशास्त्र संस्थान के निदेशक प्रोफेसर लॉरेंस पैटरसन का ये कहना है कि ये नई दवा स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुँचाती.
भारत में एक विशेष प्रकार के क्रॉकस की पंखुड़ियों से केशर बनता है जो बहुत ही कीमती होता है  तथा प्राचीन काल से अनेक रोगों के उपचार में इसका प्रयोग किया जाता है . कहीं केशर ही तो नहीं है कैंसर की दवा ? इसे जानने के लिए अभी हमें और इंतजार करना पड़ेगा . वैज्ञानिकों से अनुरोध है कि अब ज्यादा और ना इंतजार ना कराएँ क्योकि कैंसर के मरीजों की तादाद हर साल करीब 20 फीसदी बढ़ने लगी है.


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बरसात, भूकंप , विष्फोट और मेट्रो ट्रेन की यात्रा

>> 10 सितंबर, 2011

फोटो/दैनिक भास्कर रायपुर
           रायपुर से नई दिल्ली तक पानी ही पानी दृष्टिगोचर हो रहा है . रायपुर  में  पिछले 4 सितंबर से  लगातार बारिश  हो रही है . 7 सितंबर   की शाम  दिल्ली पहुंचा तो वहां मौसम सूखा था . दिल्ली हाई कोर्ट  परिसर में दर्दनांक बम विस्फोट से दहशत का माहौल था . हम भी सहकारिता प्रकोष्ट  के राष्ट्रीय संयोजक श्री धनंजय कुमार सिंह के साथ आतंकी घटनाओं से सम्बंधित खबरों में खोये हुए थे  कि अचानक एक पल के लिए कमरे में ऐसी  घड़घड़ाहट  हुई जैसे कोई भारी  सामान गिरा हो .  धनंजय जी ने पूछा क्या हुआ ? मैंने कहा लगता है भूकंप आया है . अगले ही पल समाचार चैनल में पट्टी चलने लगी .अनुमान सही निकला .  गनीमत है भूकंप का झटका ज्यादा समय तक नहीं था, मुश्किल से 4 - 6 सेकण्ड का रहा होगा . यदि ज्यादा समय तक झटका आता तो बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाती . दूसरे दिन यानी 8 सितंबर को  दिल्ली में बारिश शुरू हो गई जो 9 सितंबर को 4 बजे तक जारी है . सड़क जाम होने की आशंका से मेट्रो एक्सप्रेस का सहारा लिया . इस ट्रेन ने 20 मिनट में शिवाजी स्टेडियम से एयरपोर्ट पहुंचा दिया . सड़क रास्ते से तो समय पर पहुँचना मुश्किल था .वापस रात  में रायपुर लौटा तो देखा बारिश जारी है . लगातार 5 - 6 दिनों की झड़ी से छत्तीसगढ़ की तमाम नदियाँ उफान पर है . नदी के किनारे बसी बस्तियां जलमग्न हो गई  है , कच्चे मकानों में रहने वालों की हालत बहुत बुरी है . 
                   पिछले वर्ष भी लगभग यही स्थिति थी , सावन में नाम मात्र का पानी गिरा था तब सावन की बिदाई में एक छतीसगढ़ी कविता लिखी थी जो 25 . 08. 2010 को ग्राम चौपाल में लगी थी . कविता का शीर्षक था " भादो म बरसबे, सावन असन " -----


भादो म बरसबे, सावन असन
(छत्तीसगढ़ी कविता)

                                                  
चल दिस  सावन,
पर ते जाबे झन;
सुक्खा हे धरती ,
ते रिसाबे झन;
भादो म बरसबे ,
सावन असन;


उम्मस म पसीना ले,
चुचुवावत  हे बदन;
भविष्य के चिंता म,
बूड़े हे मन ; 
 भादो म बरसबे ,
सावन असन;l


 

रदरद ले गिरबे ,
गरजबे झन ;
भर जाय तरिया ,
फीज जाय तन;
भादो म बरसबे ,
सावन असन;


आजा ते आजा ,
अगोरत हवन ;
खेत खार ला भरदे ,
करत हन मनन;
भादो म बरसबे,
सावन असन;


                                                

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मैं कैसे करूँ आभार ?

>> 05 सितंबर, 2011

भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन और मेरा जन्मदिन एक ही तारीख को पड़ता है . इसे बहुत कम लोग जानते है . पिछले वर्ष भाई ललित शर्मा को जानकारी हो गई थी सो उन्होंने अपने ब्लाग में एक पोस्ट लगा दी . जिससे अनेक ब्लागरों को जन्मतिथि ज्ञात हो गई फलस्वरूप टिप्पणियों के माध्यम से अनेक बधाई सन्देश प्राप्त हुए . इस वर्ष चंपारण में भाजपा की कार्यशाला में किसी कार्यकर्ता माध्यम से पूरी महफ़िल को पता चल गया . मंच से ऐलान हो गया . जैसे ही मैने परिसर में  प्रवेश किया कार्यकर्ताओं से घिर गया . घर लौटा तो आफिस के कुछ अधिकारी कर्मचारी व जनप्रतिनिधि पहले से इंतजार कर रहे थे . कंप्यूटर खोला तो पता चला कि बीएस पाबला  जी ने ब्लागरों के जन्मदिन वाले अपने ब्लाग में पोस्ट लगाई है . उन्हें तथा उनके ब्लाग के माध्यम से बधाई सन्देश भेजने  वाले सभी शुभचिंतकों को धन्यवाद . साथ ही साथ उन सभी मित्रों , शुभचिंतकों का आभारी हूँ जिन्होंने प्रत्यक्ष अथवा  ई-मेल व एस एम् एस के माध्यम से बधाई दी . चंपारण में अनेक मित्रों ने आज धार्मिक व सामाजिक पुस्तकें भी भेंट की जो मेरे लिए बहुमूल्य है . अंत में यही कह सकता हूँ - मैं कैसे करूँ आभार ?


    

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शहर छोड़ खेतों की ओर जा रही हैं महिलाएं

भारत में लोग गांव में खेती बाड़ी छोड़ कर शहरों की ओर जा रहे हैं तो जर्मनी में इसके विपरीत महिलाएं शहरों में खेती बाड़ी की शिक्षा ले कर गांव में बस रही हैं. क्यों बह रही है यहां उल्टी गंगा ? जर्मनी में कॉलेज की डिग्री लेने के बाद खास ट्रेनिंग करनी होती है जो यह तय करती है कि आप का व्यवसाय क्या होगा. चाहे पत्रकार बनना हो, सेक्रेटरी या नर्स हर प्रोफेशन के लिए अलग ट्रेनिंग होती है. आज कल जर्मनी की महिलाओं में कृषि के क्षेत्र में ट्रेनिंग का चलन बढ़ गया है .  आगे पढ़े

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