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डा. रमन सिंह ने छत्तीसगढ़ महतारी को नौलखा पहनाया

>> 28 दिसंबर, 2011

 

छत्तीसगढ़
त्तीसगढ़ में 1 जनवरी 2012  से 9 नए जिलों के निर्माण की अधिसूचना जारी हो गई है . राज्य में अब जिलों की संख्या 18 से बढ़ कर 27 हो गई है . कभी यहाँ सिर्फ 7 जिले हुआ करते थे -- रायपुर,दुर्ग ,राजनांदगांव,बस्तर ,बिलासपुर, रायगढ एवं  सरगुजा . तब यह अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था . 6 जुलाई 1998 को मध्यप्रदेश में 16 नए जिले बनाये गए जिसमें से 9 इस अंचल के थे . ये है  धमतरी,महासमुंद,कवर्धा, कांकेर,दंतेवाडा , कोरबा , जांजगीर-चांपा,जशपुर और कोरिया . छत्तीसगढ़ राज्य गठन के समय कुल 16 जिले थे .  मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वर्ष 2007 में दो नये जिलों- बीजापुर और नारायणपुर का गठन किया था, जबकि इस वर्ष 2011 में उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर नौ नये जिलों के निर्माण की घोषणा की है जिनमें बेमेतरा, बलौदाबाजार, बालोद, बलरामपुर, गरियाबंद, मुंगेली, सूरजपुर, कोण्डागांव और सुकमा शामिल हैं, जो उनकी घोषणा के अनुरूप ये जिले जनवरी 2012 से अस्तित्व में आ गए और प्रदेश में जिलों की संख्या 18 से बढ़कर 27 होगई है  .            

जहाँ तक रायपुर जिले का सवाल है लगभग 14 वर्षों बाद इस जिले का पुनः विभाजन हुआ है . 24 विकासखंडों एवं 20 विधानसभा क्षेत्रों में फैले इस जिले की गिनती कभी देश के वृहत जिलों में होती थी . 6 जुलाई 1998 को इस जिले को विभाजित कर  धमतरी एवं महासमुंद जिले का निर्माण किया गया . चार विकासखंडों--धमतरी,नगरी,कुरूद एवं मगरलोड को धमतरी जिले में  तथा पांच विकासखंडों- महासमुंद,बागबहरा,पिथौरा,बसना एवं सरायपाली को महासमुंद जिले में शामिल किया गया .जिले के तीन टुकड़े  होने के बावजूद भी पंद्रह विकासखंड अभनपुर,धरसीवां,तिल्दा,सिमगा,भाटापारा,बलौदाबाजार,पलारी,कसडोल,बिलाईगढ़,आरंग,फिंगेश्वर,छुरा,गरियाबंद,मैनपुर एवं देवभोग इस जिले में रह गए थे.

रायपुर जिले का नया आकार
 नए विभाजन में रायपुर जिले को पुनः तीन भागों में विभाजित किया गया है. जिले के पंद्रह विकास खण्डों में से  बलौदाबाजार ,  भाटापारा , सिमगा , पलारी , कसडोल एवं  बिलाईगढ़ को मिलाकर बलौदाबाजार तथा फिंगेश्वर,छुरा,गरियाबंद,मैनपुर एवं देवभोग को मिलाकर गरियाबंद जिले का निर्माण किया गया है .अब रायपुर जिले  में मात्र चार विकास खंड अभनपुर , आरंग ,धरसीवां एवं तिल्दा  ही शेष रह गए है . हालाँकि इसमें रायपुर शहर भी शामिल है जो धरसीवां विकासखंड का हिस्सा है . अब इस जिले का आकार काफी छोटा हो गया है . पहले कहाँ 24 विकासखंड और अब दूसरे विभाजन के बाद मात्र 4 विकासखंड रह गए है . जिलों के नए रेखांकन के बाद अब पुराना रायपुर जिला पांच भागों रायपुर,धमतरी,महासमुंद,बलौदाबाजार एवं गरियाबंद में विभाजित हो गया है . कभी ये पांच तहसील हुआ करते थे अब पांचों तहसील जिले का आकर ले चुके है  .

अभी देवभोग ब्लाक के तेल नदी के आगे के ग्रामीणों को लगभग 250 की.मी. की दूरी तय कर जिला मुख्यालय रायपुर आना पड़ता था अब उन्हें गरियाबंद आने के लिए मात्र  150 - 160 की.मी. की दूरी तय करनी पड़ेगी . इसी प्रकार बिलाईगढ़ ब्लाक के लोगों को बलौदाबाजार आने के लिए अधिकतम  125 की.मी. की दूरी तय करनी पड़ेगी .  इससे आम लोगों को काफी राहत मिलेगी ,वे आसानी से जिला मुख्यालय तक पहुँच सकेंगें .       
    
राज्य बनाने के बाद रायपुर जिले का विभाजन  प्रशासनिक दृष्टि से काफी लाजिमी हो गया था . राजधानी होने के कारण प्रशासनिक अमले का सारा ध्यान रायपुर में ही लगा रहता है , सुदूर के क्षेत्रों में प्रशासन की पकड़ मजबूत बनाने के लिए डा. रमन सरकार ने बेहतर निर्णय लिया है . नए जिलों के निर्माण से एक ओर जहाँ आम लोगों की अड़चने दूर होंगीं तो दूसरी ओर  सरकार को अपने विकास के दृष्टिकोण को अमलीजामा पहनाने में सुविधा होगी. सरकार की इस उपलब्धि को कई पीढ़ी तक याद किया जायेगा . मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने 9 नए जिलों का निर्माण कर  छत्तीसगढ़ महतारी को सबसे महंगे आभूषण नौलखा से विभूषित किया है .  
प्रखर समाचार में ग्राम चौपाल 





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एक अटल सितारा

>> 24 दिसंबर, 2011

छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माता माननीय अटलबिहारी वाजपेयी का  राज्य निर्माण के बाद 28 जनवरी 2002 को पहली बार रायपुर आगमन हुआ तो उन्हें 36 लाख पुष्प  पंखुड़ियों की  माला से स्वागत किया गया . तस्वीर में स्वागत करते हुए दिखाई दे रहें है आज के मुख्यमंत्री डा.रमनसिंह ,तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री श्री रमेश बैस , श्री नंदकुमार साय  एवं अन्य पदाधिकारी . मैं उस समय  भाजपा के  जिलाध्यक्ष के दायित्व में था .

देश और दुनिया की राजनीतिक क्षितिज पर ध्रुव तारे की तरह अटल एक सितारा कोई है तो वह है हमारे अपने तथा देश के लाडले नेता माननीय अटलबिहारी वाजपेयी . वे देश के सर्वाधिक लोकप्रिय एवं सर्वमान्य नेता है . एक ऐसे उदार नेता जिनकी कथनी और करनी  में कभी  अंतर नहीं रहा . वे देश के एक मात्र नेता है जो भाषण के जरिये लाखों लोंगों को घंटो तक बाँधें रखने की क्षमता रखते है . ह्रदय से अत्यंत ही भावुक लेकिन तेजस्वी  नेता माननीय अटलबिहारी वाजपेयी का आज 88 वां जन्म दिन है  . श्री वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर, 1924 को ग्वालियर (मध्यप्रदेश) में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता का नाम श्रीमती कृष्णा देवी है.श्री वाजपेयी के पास 40 वर्षों से अधिक का एक लम्बा संसदीय अनुभव है. वे 1957 से सांसद रहे हैं. वे पांचवी, छठी और सातवीं लोकसभा तथा फिर दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं , तेरहवीं और चौदहवीं लोकसभा के लिए चुने गए और सन् 1962 तथा 1986 में राज्यसभा के सदस्य रहे.वे लखनऊ (उत्तरप्रदेश) से लगातार पांच बार लोकसभा सांसद चुने गए. वे ऐसे अकेले सांसद हैं जो अलग-अलग समय पर चार विभिन्न राज्यों-उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश तथा दिल्ली से निर्वाचित हुए हैं.

 माननीय अटलबिहारी वाजपेयी को 88 वें जन्मदिन पर ढेर सारी बधाई एवं शुभकामनाएं है .  

 

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भारत पाक युद्ध के चालीस साल

>> 20 दिसंबर, 2011



भारत-पाक युद्ध की तस्वीर ( गूगल से साभार ) 
भारत-पाक के बीच हुआ 1971 का युद्ध स्वतंत्र भारत के इतिहास में हमेशा अविस्मरनीय रहेगा . तब हम मात्र 14-15 साल के थे तथा हायर सेकेंडरी के छात्र थे . एक दिन स्कूल में सुबह प्रार्थना  ख़त्म होने के बाद प्राचार्य ने रुकने का संकेत दिया ; उनके हाथ में एक ट्रांजिस्टर था . उन्होंने ट्रांजिस्टर आँन किया और हम सबको भारत पाकिस्तान युद्ध की जानकारी दी . उन दिनों टेलीविजन नहीं पहुंचा था . युद्ध के समाचार रेडियो या अखबारों से ही मिलते थे . स्वाभाविक रूप से इस युद्ध की खबरों में हम सबकी दिलचस्पी रहती थी . भारतीय सैनिकों के शहीद होने , हताहत होने की खबर पाकर बड़ा क्रोध आता था . अखबारों में शहीदों के परिजनों व घायलों को आर्थिक मदद देने की खबरें भी प्रतिदिन भी छपती थी . हम सबने अपने स्कूल से भी सहायता राशि इकट्ठी कर प्रेषित किया था . सहायता राशि देने वालों के नाम अखबारों में भी छपते थे . एक दिन सारे विद्यार्थी चंदा इकट्ठा  करने  सड़क में चले गए तथा वाहनों को रोक रोक कर कुछ राशि एकत्रित की गई . यह खबर जब स्कूल तक पहुँचीं तब दूसरे दिन प्रार्थना के बाद  सबकी खूब खिचाई हुई थी , हमारी शहादत तो पहले से तय थी .    


खैर इस युद्ध को चार दशक पूरे हो चुके है .पाकिस्तान के खिलाफ इस जंग में  90 हजार से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण किया था. उस समय भारतीय सेना की कमान फील्ड मार्शल जनरल मानेक शॉ जैसे अनुभवी व कुशल सेनानायक के हाथ में थी. वे राजनैतिक दबाव की परवाह किये बगैर  अपनी रणनीति पर डटे रहे  तथा  युद्ध में  90,000 से अधिक पाकिस्तानी सैनिकों को ढाका में युद्धबंदी बना कर, भारत को दुनिया के इतिहास में अभूतपूर्व  विजय दिलाई थी . फील्ड मार्शल जनरल मानेक शॉ का 27 जून 2008 को  निधन हो गया . वे बड़े ही साहसी कर्मवीर थे , वे जीवन से भले ही हार गए लेकिन जीवन में कभी हारना नहीं सीखा . वे इस  युद्ध के हीरो थे , उनका नेतृत्व काबिले तारीफ था.




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मानवता के पुजारी

>> 18 दिसंबर, 2011


बाबा गुरु घासीदास
        तनाम पंथ के संस्थापक बाबा गुरु घासीदास की आज 18 दिसंबर को जयन्ती है .पूरे छत्तीसगढ़ में उनके अनुयायी बड़े  धूमधाम से यह पर्व मनाते है. बाबा गुरु घासीदास एक अलौकिक एवं चमत्कारिक पुरुष थे . सत्य के प्रति उनकी अटूट आस्था की वजह से ही उन्होंने बचपन में ही कई चमत्कार दिखाए जिसका लोगों पर काफी प्रभाव पड़ा . इस प्रभाव के चलते भारी संख्या में लोग उनके अनुयायी हो गए .इस प्रकार छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ की स्थापना हुई .इस संप्रदाय के लोग बाबा गुरु घासीदास को अवतारी पुरुष के रूप में मानते है . बाबा का जन्म 18 दिसम्बर 1756 को रायपुर जिले के कसडोल ब्लाक के ग्राम गिरौदपुरी में हुआ था . उनकी माता का नाम अमरौतिन तथा पिता का नाम महंगुदास था . पिता महंगुदास भी अपने पुत्र की चमत्कारिक एवं अलौकिक घटनाओं से अचंभित थे . कालांतर में गुरु घासीदास का विवाह सिरपुर की सफुरा माता से हुआ.

          18 वीं सदी में छुआछूत तथा भेदभाव का काफी बोलबाला था, बाबा गुरु घासीदास इसके सख्त  विरोधी थे . वे मानवता के पुजारी तथा सामाजिक समरसता के प्रतीक थे . उनकी मान्यता थी - " मनखे मनखे एक हे ,मनखे के धर्म एक हे ". उन्होंने जीवन मूल्यों पर अधिक ध्यान दिया तथा लोगों को शराब व मांस के सेवन से मुक्ति दिलाई. बाबा गुरू घासीदास ने समाज को सत्य, अहिंसा, समानता, न्याय और भाईचारे के मार्ग पर चलने की सीख दी .बाबा ने असमानता को दूर करने के लिए गिरौदपुरी से कुछ ही दूर स्थित घनघोर जंगल के मध्य छाता पहाड़ पर औरा-धौरा पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या की . उन्हें तपस्या अवधि में ही दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. फलस्वरूप बाबाजी ने अपने दिव्य शक्ति से समाज में व्याप्त असमानताओं, रूढ़ियों तथा कुरीतियों को दूर कर समाज को एक नई दिशा दी. उन्होंने संपर्क में आने वाले हर जीव की आत्मा को शुद्ध किया. उनके उपदेश से लोग अंधकार से प्रकाश की ओर, दुष्कर्म से सद्कर्म की ओर तथा असत्य से सत्य की ओर जाने के लिए प्रेरित हुए .उन्होंने समाज के प्रचलित कर्मकांडों, आडंबरों तथा जाति प्रथा का विरोध किया. गुरू घासीदासजी ने मद्यपान,मांस-भक्षण,ध्रुम्रपान तथा पशुबलि का विरोध किया . उन्होंने अपने जीवन काल में स्त्रियों की दशा सुधारने और समाज के नैतिक मूल्यों में सुधार लाने का विशेष प्रयास किया. गुरू घासीदास जी के उपदेश से समाज में सत्य, अहिंसा, करूणा,दया,क्षमा,एकता,प्रेम,परोपकार और सम्मान की भावना  विकसित हुई . छत्तीसगढ़ के जनजीवन में आज भी बाबा गुरु घासीदास के विचारों की छाप स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है .

          बाबा गुरु घासीदास के विचारों से प्रेरणा लेकर मैंने 18 दिसंबर 2007 को उनकी जयन्ती के अवसर पर " नशा हे ख़राब : झंन पीहू शराब " का नारा देते हुए  नशामुक्ति आन्दोलन की शुरुवात की थी. इस आन्दोलन से सम्बंधित पोस्ट आप " ग्राम-चौपाल " में 24 जून 2010 के अंक में पढ़ सकते है .
 

बाबा गुरू घासीदास की  जयन्ती के अवसर  पर सतनामी  संप्रदाय के सभी बहनों और भाइयों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !



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प्रयोगशाला में सृष्टि की तलाश

>> 14 दिसंबर, 2011



सर्न की विशाल भौतिक  प्रयोगशाला
सृष्टि हम सबके लिए एक पहेली है . वैज्ञानिक बरसों से इस पहेली को बुझने का प्रयास कर रहे है . "सर्न " के वैज्ञानिकों ने सृष्टि की उत्पत्ति करने वाले बिंदु को ढूंढ़ निकालने का दावा किया है .  स्विट्जरलैंड स्थित दुनिया की सबसे बड़ी भौतिक  प्रयोगशाला " सर्न  " में  बरसों से  इस बिंदु जिसे हिग्स बोसोन या गॉड पार्टिकल कहा जाता है की खोज की जा रही है . मजे की बात तो यह है कि सृष्टि की तलाश में हजारों वैज्ञानिकों के साथ भारत की महिला वैज्ञानिक डा. अर्चना शर्मा भी जुटी हुई है .  उन्होंने  सृष्टि के नजदीक पहुँचने का दावा करते हुए कहा है कि  हम भूंसे के खलिहान में सुई की तलाश कर रहे है .डा. शर्मा के मुताबिक हम  गॉड पार्टिकल के नजदीक जरुर पहुँच गए है लेकिन उसे पूरी तरह खोजने में साल भर और लग सकता है . यदि वैज्ञानिक  इसे खोज निकालने में सफल हो जाते है तो यह शताब्दी की सबसे बड़ी वैज्ञानिक सफलता मानी जायेगी अन्यथा यह पहेली केवल पहेली बन कर रह जायेगी . 

 

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पांडव नृत्य और जीवन का चक्रव्यूह

>> 04 दिसंबर, 2011

द्रोणाचार्य का चक्रव्यूह 
त्तराखंड में इन दिनों कड़ाके की ठण्ड पर रही है ,यहाँ का  न्यूनतम तापमान 4  डिग्री सेंटीग्रेट हो गया है .यदि तापमान गिरने का सिलसिला यूँ ही चलता रहा तो 8-10  दिनों में शून्य डिग्री तक पहुँच जायेगा . यहाँ रात बहुत बड़ी तथा दिन बहुत छोटा है . सुबह 8 बजे के बाद सूर्योदय होता है तथा शाम 5 बजे सूर्यास्त होता है . सुबह 11 बजे तक लोग रजाई में जकड़े रहते है . कार्य की दृष्टि से सुबह 11 बजे से 3 बजे तक ही समय रहता है . यानी केवल 4 घंटे का दिन होता है .

पर्वतीय क्षेत्रों के सीढ़ीदार खेत 
वैसे भी इन दिनों उत्तराखंड के लोग कमोबेस खाली ही  रहते है . रुद्रप्रयाग जहाँ मै पिछले एक सप्ताह से रुका हूँ पूरा इलाका तीर्थाटन व पर्यटन क्षेत्र है .यहाँ से केदारनाथ लगभग 100  कि.मी. , बद्रीनाथ-180 कि.मी. , कर्णप्रयाग-35 कि.मी., जोशीमठ-125 कि.मी.एवं गुप्तकाशी-40 कि.मी. दूरी पर है .केदारनाथ और बद्रीनाथ के पट मई में खुलते है और नवंबर में बंद हो जाते है . पट खुलते ही श्रद्धालूओं व सैलानियों के आने जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है .इस मौसम में  तो बिरले लोग ही इधर आते है . अधिकांश लोगों की आजीविका इसी से जुड़ी है . इसके अलावा यहाँ आजीविका का मुख्य साधन कृषि है . धान , दलहन व तिलहन के फसल की कटाई हो चुकी है . किसानों ने गेहूं की बुवाई कर ली है , किन्ही किन्हीं खेतों में गेहूं के पौधें २-3 इंच ऊग आये है . इधर के खेत पहाड़ों के ऊपर छोटे छोटे व सीढ़ीनुमा होते है . सिचाई के साधन नहीं के बराबर है ,बरसात के अलावा पहाड़ों की ऊपरी सतह से झरते हुए जल के भरोसे ही रहना पड़ता है .  यह विडम्बना ही है कि इस इलाके में जीवनदायिनी गंगा की अनेक सहायक नदियाँ बारहों महीनें बहती है फिर भी यहाँ की खेती प्यासी है , किसानों के खेत सूखे है . यदि नदियों के जल का उदवहन कर खेतों तक पहुँचाया जाय तो कृषि के क्षेत्र में काफी उन्नति हो सकती है . बताया जा रहा है कि प्रदेश की खंडूरी सरकार ने लिफ्ट इरीगेशन की कुछ परियोजनाएं स्वीकृत की है ,  कुछ के काम भी शुरू हो गए है . वैसे नदी के जल से अनेक जल-विद्युत् परियोजनाएं संचालित हो रही है . जिसका विरोध गंगा बचाओ अभियान वाले कर रहें है हालाँकि इस इलाके में नदी के जल-प्रदुषण की बड़ी समस्या नहीं है .

 वैवाहिक कार्यक्रमों का जोर

जयमाला 
आजकल लोगों के पास काम कम है . शायद इसीलिये इस मौसम में शादियों का रिवाज है ,अमूमन शादियाँ दिन में ही होती है . चारोँ तरफ शादियों की धूम मची है . हमें भी एक कार्यकर्ता की लड़की की शादी में यहाँ के पदाधिकारियों के साथ शामिल होने का सौभाग्य मिला . कार्यालय से लगभग 1 कि.मी. ऊपर पहाड़ पर पैदल चलकर जाना पड़ा . स्थानीय लोग तो पहाड़ पर आसानी से चढ़ गए लेकिन हमारी तो स्वांस ही फुल गई , दो बार मेरे कारण पूरे काफिले को रूकना पड़ा . विवाह स्थल पर पहुंचें तो बारात पहले ही आ चुकी थी . मंच पर वर-वधु जयमाला हाथ में लिए संकेत का इंतजार कर रहे थे . जैसे ही वीडियोंग्राफर और फोटोग्राफर अपनी पोजीशन में आये दोनों ने एक दूसरे के गले में जयमाला डाल दी . फिर शुरू हुआ बधाई देने का सिलसिला . उसी समय लड़की की माँ ने जो भाजपा की कार्यकर्ता है हम सबको एक एक लिफाफा दिया . उसमें 10 रुपये का एक नया नोट था .मैंने उस लिफाफे में एक सौ का नोट डाला और वापिस कर दिया . दोपहर का भोजन भी वहीं करके वापस आ गए.

 पांडव-नृत्य

चक्रव्यूह की ओर रथ बढ़ते अभिमन्यु
गाँव गाँव में इन दिनों पांडव नृत्य का जोर है . कड़कड़ाती ठण्ड के बावजूद यह कार्यक्रम लगातार 20 - 25 दिनों  तक रात-दिन चलता है . अंतिम दिनों में पांडवों के स्वर्गारोहण का मंचन किया जाता है . रुद्रप्रयाग से लगभग 20 कि.मी. दूरी पर ग्राम " नारी " के पांडव नृत्य कार्यक्रम में हमें भी जाने का अवसर मिला ,यह गाँव केदार नाथ विधान सभा क्षेत्र में है . मेरे साथ जिलाध्यक्ष श्री वाचस्पति सेमवाल ,क्षेत्रीय विधायक श्रीमती आशा नौटियाल एवं अन्य  पदाधिकारी भी थे. रुद्रप्रयाग से सड़क के रास्ते हम लोग दोपहर 12  बजे सतेराखाल पहुंचें जहाँ स्थानीय कार्यकर्ताओं ने ढोल मंजिरें के साथ स्वागत किया . वहां से लगभग 1 कि.मी.  पैदल खेतों के मेड़ों और पगडंडियों से होकर नीचे गए जहाँ एक खेत को समतल करके चक्रव्यूह बनाया गया था .  चारों तरफ लोगों का हुजूम लगा था . लोग दूर दूर से पैदल चलकर आये थे . एक किनारे में कुछ छोटी छोटी दुकाने लगी थी .पूरे मेले का दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा था . स्वागत की रस्म अदायगी के बाद हम लोग एक स्थान पर बैठ गए . सबसे पहले सावधान सावधान की हुंकार भरते हुए कौरवों दल का आगमन हुआ . कौरव दल का नेतृत्व गुरु द्रोणाचार्य कर रहे थे . द्रोणाचार्य ने एक एक करके सभी महारथियों को चक्रव्यूह के एक एक द्वार का जिम्मा दिया . कुछ ही देर में अभिमन्यु अपने साथियों के साथ पहुचे , अभिमन्यु को एक खाट में बैठा कर लाया गया . लगभग 10 - 12 नवजवान खाट को चारों तरफ से उठाये हुए थे . जैसे ही वे मंच के पास आये अभिमन्यु ने चार फीट उचाई से छलांग लगा कर चक्रव्यूह के प्रथम द्वार पर पहरा दे रहे जयद्रथ को ललकारा . जयद्रथ भी कहाँ चुकने वाला था उसने भी अपने अन्य साथियों को सावधान होने का संकेत दिया और अभिमन्यु से जा भिड़ा . दोनों तरफ से डायलाग हुए . अभिमन्यु जब कोई डायलाग बोलता था तब वहां उपस्थित 5 हजार लोग ताली बजाकर स्वागत करते थे .दोनों में पहले वाक-युद्ध फिर तीर-युद्ध उसके बाद गदा-युद्ध हुआ. अंत में मल-युद्ध में जयद्रथ मूर्छित हो गया .अभिमन्यु ने पहली फतह हासिल करने के बाद दूसरे द्वार की ओर रूखसत किया और हम लोग पास ही में स्थित एक प्राचीन मंदिर में माँ चंडी का दर्शन करके बिदा हो गए .


पांडव नृत्य की ओर बढ़ता कारवां

जयद्रथ और अभिमन्यु के युद्ध को मंच से निहारते अतिथि
गाँव के गणमान्य नागरिक अतिथियों का स्वागत करते हुए

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