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अल्ला मेघ दे पानी दे . . .

>> 30 जून, 2012

ई दिनों से बारिस का इंतजार है, 20 -21 जून को अच्छी बारिस हुई थी सो किसानों ने धान की बोनी शुरू कर दी. अब मौसम ने फिर यू टर्न ले लिया है यानी फिर वही गर्मी , तेज धूप और पसीना . खेतों के अंकुरित बीज धूप में झुलसाने लगे है. किसान बहुत अधिक चिंतित है . मौसम विभाग भी मौन है शायद उसे भी हवा के रुख का इंतजार है. एक दौर था जब गाँव में बरसात के लिए आल्हा-उद्दल के मल्हार गाये जाते थे,  लेकिन आज की पीढ़ी आल्हा- उद्दल को नहीं जानती. बरसात के लिए कभी श्रीरामनाम सप्ताह का आयोजन किया जाता था ,यज्ञ पूजन किये जाते थेयुवा और बच्चे फेसबुक में तथा बड़े टेलीवीजन के धारावाहिक में मस्त है . मानसून की अनियमितता से हम सभी चिंतित है . नित्य-प्रतिदिन प्रकृति से खिलवाड़ करने का खामियाजा भी हमें ही भुगतना पड़ेगा. यह प्रकृति से खिलवाड़ का ही नतीजा ही है कि तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है. जो कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था को चौपट कर रहा है.  छत्तीसगढ़ में खरीफ मौसम में धन की खेती होती है . यदि मानसून ने धोखा दिया तो किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर जायेगा. 
शायद ऊपर वाला इनकी गुहार जरुर सुनेगा ...........
 
                         

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दिमाग को धोखा देने वाला चश्मा

>> 05 जून, 2012

जापान के वैज्ञानिकों ने ऐसा चश्मा बनाया है जो दिमाग को चकमा देकर इंसान को मूर्ख बना सकता है. इसे पहनने के बाद खाने पीने की चीचें भी छोटी या बड़ी दिखाई पड़ने लगती हैं. जो मोटापे के शिकार है उनके लिए ये कारगर हो सकता है.

टोक्यो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा चश्मा विकसित किया है जो चीजों को उनके वास्तविक आकार से बढ़ाकर या घटाकर दिखा सकता है. यूनिवर्सिटी ग्रेज्युएट स्कूल ऑफ इनफर्मेशन साइंस के प्रोफेसर मिशिताका हिरोसे का कहना है कि प्रयोग के दौरान इसकी सफलता दर करीब 80 प्रतिशत है.

इसका प्रयोग उन लोगों पर किया गया जो बिस्कुट खाना चाहते हैं.चश्मे की वजह से बिस्कुट का आकार वास्तविक आकार से 50 फीसदी ज्यादा बड़ा दिखाई दिया. नतीजा ये हुआ कि लोगों ने 10 फीसदी कम बिस्कुट खाया. इसी तरह कुछ लोगों को खाने के लिए कुकीज दिया गया. चश्मा पहनने के बाद इसका आकार वास्तविक आकार से दो तिहाई हो गया. नतीजा ये हुआ कि कुकीज खाने वालों ने 15 फीसदी ज्यादा कुकीज खाए.

प्रोफेसर मिशिताका हिरोसे का कहना है, "ये सारा खेल आभासी सच्चाई से जुड़ा है. यथार्थ दिमाग में होता है. कंम्प्यूटर का इस्तेमाल करके कैसे इंसान के दिमाग को धोखा दिया जा सकता है ये जानना काफी अहम है.''

इस यंत्र के बारे में हिरोसे कहते हैं कि इसमें एक कैमरा लगा होता है जो छवि को कंम्यूटर तक भेजता है. और फिर इसे कंम्यूटर कम या ज्यादा करता है. जो लोग चश्मा पहने होते हैं उन्हें इसका वास्तविक आकार नहीं पता चलता. इसके अलावा हिरोसे की टीम ने एक मेटा कुकी भी बनाया है जिसे पहनने के बाद दिमाग को धोखा देना एकदम आसान हो जाएगा. इसमें ये भी हो सकता है कि आप हकीकत में स्नैक खा रहे होंगे जबकि आपको लगेगा कि आप सादा बिस्कुट खा रहे हैं.

हालांकि हिरोसे का कहना है कि वो इसका व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं करेंगे लेकिन इसका फायदा उन लोगों को जरूर हो सकता है जो मोटापे के शिकार हैं. आंकड़े बताते हैं कि मोटापे की बीमारी सबसे ज्यादा अमेरिका में है. करीब एक तिहाई आबादी मोटापे से ग्रस्त है. भारत की करीब पांच फीसदी आबादी मोटापे से ग्रस्त हो चुकी है. इसमें सबसे ज्यादा लोग पंजाब के हैं.   
 DW News

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विकसित देशों का बाई-प्रोडक्ट है कैंसर

>> 03 जून, 2012


विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि अगले दो दशक में कैंसर पीड़ितों की संख्या में 75 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है.शोधकर्ताओं का अनुमान है कि सन 2030 तक कैंसर के दो करोड़ 20 लाख नए मामले सामने आएंगे.शोध पत्रिका 'लानसेट' में छपे इस अध्ययन में कहा गया है कि इसका एक कारण यह है कि बहुत सारे अन्य रोग समाप्त हो रहे हैं और इन रोगों के लिए ली जाने वाली दवाएं और अन्य उपाय कैंसर की प्रमुख वजह बन रहे हैं. इसके लिए आँख मूँदकर पश्चिमी देशों की अस्वस्थ जीवन शैली को भी प्रमुख कारण मानते हुए उन्होंने विकासशील देशों को आगाह किया है कि वे पश्चिमी देशों की गलतियों से सीख लें तथा उनकी गलतियां को ना दोहराएँ.
 
शोधकर्ताओं के अनुसार हालांकि संक्रमण से होने वाले कैंसर जैसे सर्वाइकल या फिर लीवर कैंसर के मामलों में कमी आ रही है, लेकिन इनकी कमी कैंसर के उन मामलों से काफी पीछे रह जाएगी जो कि गलत आदतों की वजह से काफी तेजी से बढ़ रही हैं. इनमें अत्यधिक मात्रा में शराब, सिगरेट के सेवन से होने वाले फेफड़ों, आंत और स्तन कैंसर प्रमुख हैं.

बी.बी.सी.के मुताबिक ये शोध फ्रांस के लियोन शहर स्थित इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर अर्थात् आई. ए.आर.सी. और अमेरिकन कैंसर सोसायटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है. इस शोध कार्य के प्रमुख और आई. ए.आर.सी. के वैज्ञानिक फ्रेडी ब्रे के मुताबिक कैंसर उन देशों का एक बाई-प्रोडक्ट है जहां शिक्षा, आमदनी और जीवन शैली बेहतर हुई है. ब्रे और उनके साथी शोधकर्ताओं का अनुमान है कि साल 2030 तक 184 देशों में कैंसर के करीब  दो करोड़ 22 लाख नए मामले सामने आएंगे. ज्यादातर विकासशील देशों में लोग उस कैंसर से पीड़ित हैं जो संक्रमण की वजह से होता है. लेकिन भविष्य में इन्हें न सिर्फ इस तरह के कैंसर से निपटना होगा, बल्कि बदलती जीवन शैली की वजह से होने वाले कैंसर से भी लड़ना पड़ेगा. ब्रे का अनुमान है कि चीन में लोगों में धूम्रपान की बढ़ती लत से अगले कुछ दशकों में स्थिति खराब हो सकती है.  विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर का इलाज बहुत महंगा है, इसलिए गरीब देशों को इससे बचाव के उपायों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है.

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