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अक्षुण्ण है भारतीय संस्कृति की मौलिकता - पं. दीनदयाल उपाध्याय

>> 24 सितंबर, 2012



      पं. दीनदयाल उपाध्याय की जंयती 25 सितम्बर पर विशेष 
पं. दीनदयाल उपाध्याय एक महान राष्ट्र चिन्तक एवं एकात्ममानव दर्शन के प्रणेता थे. उन्होने मानव के शरीर को आधार बना कर राष्ट्र के समग्र विकास की परिकल्पना की. उन्होने कहा कि मानव के चार प्रत्यय है पहला मानव का शरीर, दूसरा मानव का मन, तीसरा मानव की बुद्धि  और चौंथा मानव की आत्मा. ये चारों पुष्ट होंगे तभी मानव का समग्र विकास माना जायेगा. इनमे से किसी एक में थोड़ी भी गड़बड़ है तो मनुष्य का विकास अधूरा है जैसे यदि किसी के शरीर में कष्ट है और उसे 56 भोग दिया जाये तो उसकी खाने में रूचि नहीं होगी. यदि कोई व्यक्ति बहुत ही स्वादिष्ट भोजन कर रहा है उसी समय यदि कोई अप्रिय समाचार मिल जाय तो उसका मन खिन्न हो जायेगा. भोजन तो समाचार मिलने के पूर्व जैसा स्वादिष्ट था अब भी वैसा ही स्वादिष्ट है लेकिन अप्रिय समाचार से व्यक्ति का मन खिन्न हो गया इसीलिये उसके लिये भोजन क्लिष्ट हो गया. यानी भोजन करते वक्त ‘‘आत्मा’’ को जो सुख मिल रहा था वह मन के दुखी होने से समाप्त हो गया. पं. दीनदयाल जी ने कहा कि मनुष्य का शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा ये चारो ठीक रहेंगे तभी मनुष्य को चरम सुख और वैभव की प्राप्ति हो सकती है. जब किसी मनुष्य के शरीर के किसी अंग में कांटा चुभता है तो मन को कष्ट होता है, बुद्धि हाथ को निर्देषित करती है कि तब हाथ चुभे हुए स्थान पर पल भर में पहॅुंच जाता है और काटे को निकालने की चेष्टा करता है. यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.
                         सामान्यतः मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि, और आत्मा  इन चारो की चिंता करता है. हमारा व्यक्तित्व इन चार इकाईयो में होकर ही पूर्ण होता है। व्यक्ति की इन चारो इकाईयो में जितना अधिक सामंजस्य व एकता होगी हमारा  व्यक्तित्व  उतना ही निखरेगा. इसे राष्ट्र के परिपेक्ष्य में परिभाषित करते हुये कहा कि राष्ट्र के भी चार आधारभूत तत्व है (1) देश (2) जनता (3) संस्कृति और (4) चिति. इन चारो में से किसी एक का भी अभाव हो तो काई भी देश समृद्ध व सशक्त नहीं बन सकता। इनमें चिति ही राष्ट्र की आत्मा तथा उसकी मूल चेतना है.
पं. दीनदयाल उपाध्याय की मान्यता थी कि भारत की, आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्में से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा. भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी। विष्व को भी यदि हम कुछ सिखा सकते है तो उसे अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं कर्तव्य-प्रधान जीवन की भावना की ही शिक्षा दे सकते है, राजनीति अथवा अर्थनीति की नहीं उसमें तो शायद हमको ही उल्टे कुछ सीखना पड़े अर्थ, काम और मोक्ष के विपरीत धर्म की प्रमुख भावना ने भोग के स्थान पर त्याग व अधिकार के स्थान पर कर्तव्य तथा संकुचित असहिष्णुता के स्थान पर विशाल एकात्मता प्रकट की है. इनके साथ ही हम विश्व  में गौरव के साथ खड़े हो सकते है.
 
कच्छ करार निषेध आन्दोलन में श्री अटलबिहारी वाजपेयी  के साथ पं. दीनदयाल उपाध्याय (सबसे दाएं)
             भारतीय जीवन का प्रमुख तत्व उसकी संस्कृति अथवा धर्म होने के कारण उसके इतिहास में भी जो संघर्ष हुये है, वे अपनी संस्कृति की सुरक्षा के लिए ही हुए है तथा इसी के द्वारा हमने विश्व में ख्याति भी प्राप्त की है. हमने बड़े-बड़े साम्राज्यो के निर्माण को महत्व न देकर अपने सांस्कृतिक जीवन को पराभूत नहीं होने दिया. यदि हम अपने मध्ययुग का इतिहास देखे तो हमारा वास्तविक युद्ध अपनी संस्कृति के रक्षार्थ  ही हुआ है. उसका राजनीतिक स्वरूप यदि कभी प्रकट भी हुआ तो उस संस्कृति की रक्षा के निमित ही. राणा प्रताप तथा  राजपूतो का युद्व केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए नही था अपितु धार्मिक स्वतंत्रता के लिए ही था. छत्रपति शिवाजी ने अपनी स्वतंत्र राज्य की स्थापना गौ-ब्राम्हण प्रतिपालन के लिए ही की, सिक्ख-गुरूओ ने समस्त युद्ध-कर्म धर्म की रक्षा के लिए ही किए. इन सबका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि राजनीति का कोई महत्व नहीं था अथवा राजनीतिक गुलामी हमने सहर्ष स्वीकार कर ली, बल्कि हमने राजनीति को हमने जीवन में केवल सुख का कारण मात्र माना है, जबकि संस्कृति ही हमारा जीवन है.
                आज भी भारत में प्रमुख समस्या सांस्कृति ही है वह भी आज दो प्रकार से उपस्थित है, प्रथम तो संस्कृति को ही भारतीय जीवन का प्रथम तत्व मानना तथा दूसरा इसे मान लेने पर उस संस्कृति का रूप कौन सा हो विचार के लिए. यघपि यह समस्या दो प्रकार की मालूम होती है, किन्तु वास्तव में है एक ही. क्योकि एक बार संस्कृति को जीवन का प्रमुख एवं आवश्यक  तत्व मान लेने पर उसके स्वरूप के सम्बन्ध में झगड़ा नहीं रहता, न उसके सम्बन्ध में किसी प्रकार का मतभेद ही उत्पन्न होता है, यह मतभेद तो तब उत्पन्न होता है जब अन्य तत्वो को प्रधानता देकर संस्कृति को उसके अनुरूप उन ढाचो में ढंकने का प्रयत्न किया जाता है. पं. दीनदयाल उपाध्याय ने संस्कृति को प्रधानता देते हुये यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि देश  की संस्कृति की देश  की आत्मा है, तथा यह एकात्म होती हे. इसकी मौलिकता सदैव अक्षुण्ण रहती है. 
 

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अमर हुए अमृत माटी के हिमायती

>> 16 सितंबर, 2012

मान.श्री मोहन भागवत जी के साथ चंपेश्वर महादेव 


की आराधना करते हुए माननीय सुदर्शन जी .
                   राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक श्रद्धेय के.सी..सुदर्शन का आज सुबह जागृति मंडल रायपुर में निधन हो गया. आज प्रातः जब यह दुखद समाचार मिला तो सहसा विश्वास नहीं हुआ। वे 81 वर्ष के थे . मृत्यु पूर्व उन्होंने प्रतिदिन की तरह आज भी मार्निंग वाक किया तथा वहां से लौटकर प्राणायाम कर रहे थे कि अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा .
                  यह विचित्र संयोग ही है कि उनका जन्म और अवसान रायपुर में ही हुआ है. उन्हें छत्तीसगढ़ से काफी लगाव रहा है, उन्होंने चंपारण के पिछले प्रवास में सरसंघचालक मान.मोहन भागवत जी एवं संघ की ओर से भाजपा के प्रभारी मान. सुरेश सोनी जी के साथ करीब 1 घंटे तक भगवान चंपेश्वर महादेव में पूजा अर्चना की तथा दुग्धाभिषेक किया.
            उनके इस प्रवास में उन्हें निकट से जानने का अवसर मिला . वे निहायत ही नेक और ज्ञानवान इन्सान थे . जैविक कृषि के वे परम हिमायती थे उन्होंने मुझे घंटों तक अमृत माटी के निर्माण और महत्व के बारे में समझाया था . जलवायु परिवर्तन से भी वे काफी चिंतित थे . उन्होंने जल संवर्धन के उपाय सुझाते हुए कम से कम पानी में अधिक से अधिक पैदावार लेने वाले मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ किसानों के नाम बताये तथा उनसे मिलाने का वादा किया था . उनकी व्यस्तता के चलते यह संभव नहीं हो पाया . मुझे अच्छी तरह याद है , जब वे दोपहर को चंपारण पहुंचें तब काफी थके हुए थे लेकिन आकर उन्होंने तुरंत आराम नहीं किया . उन्होंने आते ही अपने लिए आरक्षित कमरे का मुआयना किया . उनके बाथरूम की टोंटी ख़राब थी पानी रिस रहा था उन्होंने तुरंत प्लंबर बुलाने के लिए कहा . प्लंबर ने आकर जब तक टोंटी ठीक नहीं किया तब तक उन्होंने न कपड़े बदले और ना ही आराम किया . वे पानी के व्यर्थ बहाने से काफी चिंतित हो गए थे . ऐसे थे हमारे अपने सुदर्शन जी . निश्चित रूप से उनके निधन से देश को अपूरणीय क्षति हुई है . मैं ईश्वर से उनकी आत्मा की शांति की अपील करता हूँ .  
सन 2010 में चंपारण में भगवान चंपेश्वर महादेव की आराधना करते हुए स्व. सुदर्शन जी . साथ में है मान.श्री मोहन भागवत जी, मान. श्री सुरेश सोनी जी,मान.श्री भैय्या जी आदि

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हिन्दी बेचारी और मेरी लाचारी

>> 14 सितंबर, 2012

व्यंग लेख  

लेडीज़ एंड जेंटलमेन,
     गुड मार्निंग


पूरे इण्डिया में 14 सितंबर को औपचारिक रूप से हिंदी दिवस मनाया गया. मेरा स्कूल मीडियम इंगलिश है तो क्या हुआ यहाँ भी हिंदी दिवस पर गोष्ठी का प्रोग्राम रखा गया.  हमारे प्रिंसिपल  मि. के. पी. नाथ ने हिंदी की महत्ता पर प्रकाश डाला तथा हिंदी की गरिमा बढ़ाने पर बल दिया. हिंदी के टीचर मि. टी.आर. गर्ग ने हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु महत्वपूर्ण टिप्स दिये.प्रोग्राम के अंत में उन्हें हिंदी की उत्कृष्ट सेवा के लिए सम्मानित कर एक मोमेंटो प्रदान किया गया . स्कूल से लौटते वक्त हमें रोड में जगह जगह हिंदी दिवस के पोस्टर दिखाई दिये. घर पहुचते ही मैने थोड़ा ब्रेकफास्ट लिया और रोज की तरह बैट बाल लेकर समीप के क्रिकेट ग्राउंड की तरफ निकल गया . पिंटू को भी साथ लेकर जाना था उसका घर आन द वे है , उसके घर "ग्रीन हॉउस" में एंट्री करते ही पिंटू के डैडी प्रभाकर अंकल मिले उन्हें नमस्ते किया और पिंटू के साथ क्रिकेट खेलने निकल गया . ग्राउंड में पहले से ही अनेक फ्रेंड्स मौजूद थे . एक-दूसरे को हाय हैलो करने के बाद हम लोग क्रिकेट खेलने लगे , कुछ देर खेलने के बाद हम लोग गप्प मारने बैठ गए . यहाँ भी हिंदी दिवस की चर्चा शुरू हो गई . सभी मित्र अपने अपने स्कूल में हुए प्रोग्राम पर कमेन्ट करने लगे. किसी ने कहा कि हमें हिंदी बोलने की प्रेक्टिस करनी चाहिए क्योकि हिंदी हमारी मातृ भाषा है अतः हमें हिंदी को इंपोर्टेंस देना चाहिए. किसी ने अंगरेजी की वकालत की तो कुछ ने दोनों भाषा को सामान रूप से अपनाने पर बल दिया , इस बीच अचानक तेज बारिस होने लगी और हम सब अपने अपने व्हीकल से घर की ओर भागे. हिंदी दिवस पर हमारी चर्चा अधूरी ही रही, मैंने सोचा घर पहुँच कर मम्मी-डैडी से हिन्दी दिवस पर चर्चा करूँगा. घर पहुंचा तो देखा कि डैडी आफिस से लौटकर सेक्सपियर के उपन्यास में खोये हुए है तथा मम्मी टी.व्ही.सीरियल देखनें में व्यस्त है. मैंने कपड़े चेंज किये और पोर्च में बैठकर बारिस के पानी के तेज प्रवाह से चिथड़े चिथड़े हो कर बहते हुए हिंदी न्यूज पेपर के टुकड़ों को टकटकी लगाये देखता रहा.
आपका - आर.सी.गंग
                             आप सबको हिंदी दिवस की ढेर सारी बधाई

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भूल हुई है अपार, फिर भी मिला है प्यार

>> 08 सितंबर, 2012

संचार के विभिन्न माध्यमों से जन्मदिन पर ढेर सारे बधाई सन्देश प्राप्त हुए है.विज्ञानं का युग है अतः संदेशों के आदान-प्रदान में ना असुविधा होती है और ना ही विलंब. संचार के अनेक माध्यम हो गए है .एक ज़माना था जब डाकिये का इंतजार करते करते आँखें थक जाती थी लेकिन अब तो पलक झपकते ही एस.एम.एस.मिल जाता है. मोबाईल की कनेक्टिविटी बढ़ जाने से एक दूसरे से बराबर संपर्क बना रहता है. जन्मदिन हो या कोई तीज-त्यौहार बधाई देने की परंपरा आम हो गई है. सामान्यतया अपने दिन को गुप्त रखता हूँ लेकिन पिछले दो वर्षों से इसकी जानकारी कई लोगों को हो जाने के कारण इस बार हजारों की तादाद में बधाई सन्देश प्राप्त हुए है. किसी ने एस.एम.एस.किया तो किसी ने मोबाईल से सन्देश से सीधे बात की. कुछ मित्रों ने रेडियो,अखबार और टेलीफोन का सहारा लिया. सोशल नेट्वर्किंग सिस्टम से हजारो बधाई सन्देश प्राप्त हुए है. फेसबुक में 3000 से अधिक मित्र है जिसमें अधिकांश सक्रीय है अतः सभी ने बधाइयाँ दी. कुछ ने अच्छे अच्छे चित्र भी बनाये.

जन्मदिन की व्यस्तताओं को भांप कर ही मैंने एक दिन पूर्व यानी 4 सितंबर को ही वृद्धाश्रम जाने का प्रोग्राम बना लिया था, सो अपनी माता जी और धर्मपत्नी के साथ माना कैम्प स्थित वृद्धाश्रम पहुंचे. वृद्धाश्रम के संचालक श्री राजेन्द्र निगम जी हमारे पूर्व परिचित है सो फोन करते ही वे भी आ गए. हम अपने साथ कुछ गरम कपड़े और खाद्य सामग्री भी ले गए थे . जैसे ही हम आश्रम पहुंचे तेज बारिस शुरू हो गई. अतः आश्रम में निवासरत सभी वृद्धों से सामूहिक मुलाकात नहीं हो सकी. सबसे अलग अलग शिविर में जाकर उनका कुशलक्षेम पूछा और कपड़े व्वा खाद्य सामग्री देकर हम वापस आ गए.
सुबह उठते ही बधाई देने वालों का ताँता लग गया. बधाई देने वालों में पार्टी के कार्यकर्ताओं के अलावा कुछ अधिकारी कर्मचारी भी थे परन्तु ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की संख्या ज्यादा थी. सबसे मिलने के पश्चात् अपने दफ्तर पहुंचा जहाँ के अधिकारी कर्मचारी पूरी तैयारी के साथ इंतजार कर रहे थे. यहं बाकायदा केक मंगाया गया था. मेरे कक्ष में गुब्बारे भी लटकाए गए थे जैसे किसी बच्चे का जन्मदिन हो. यह दृश्य देखकर मुझ पर बालपन सवार हो गया लेकिन कुछ ही देर में जब केक लाया गया तो उसमें 59 का लेबल देखकर बालपन का भूत उतर गया और चिंता की रेखाएं उभर आईं. आज हम 58 वर्ष के हो गए है यह अहसास केक काटते समय ही हो गया था.

बहरहाल आज अनेक कार्यक्रमों में शामिल हुआ . अभनपुर में भी केक काटकर वृक्षारोपण किया फिर अपने गृहग्राम खोला में शिक्षक दिवस समारोह में हिस्सा लिया जहाँ अनेक शिक्षकों के सम्मान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. तत्पश्चात फिंगेश्वर में आयोजित साध्वी प्रज्ञा भारती के प्रवचन कार्यक्रम में भाग लेने के लिए रवाना हुआ. रास्ते में नवापारा के भंडार गृह निगम के स्टाफ ने रोककर स्वागत किया तथा बधाइयाँ दी. थोड़ा आगे बढ़े तो भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने रोक लिया और खोलीपारा स्कुल में लेजाकर केक कटवाया तथा वृक्षारोपण कराया. यहाँ भी शिक्षकों का सम्मान करके फिंगेश्वर के लिए बढ़ा. फिंगेश्वर का कार्यक्रम समापन की ओर था, हमने तत्परता से मंच के सामने वाली सीट हासिल की . साध्वी प्रज्ञा भारती ने व्यासगादी से ना केवल हमारे आने की सूचना दी बल्कि उपस्थित जनसमुदाय से हाथ उठाकर जन्मदिन की बधाई देने का आग्रह किया. देखते ही देखते पंडाल में उपस्थित 10 हजार से भी अधिक लोगों ने हाथ उठाकर बधाई दी. मेरे लिए यह  भाव विभोर करने वाला क्षण था. प्रवचन के अंत में उन्होंने व्यासगादी में आमंत्रित किया तथा पुष्पाहार  पहनाकर आशीर्वाद प्रदान किया तथा एक राधाकृष्ण की तस्वीर भेंट की. कार्यक्रम के आयोजक श्री अशोक राजपूत ने बधाई देकर कार्यक्रम में आने के लिए आभार प्रकट किया. मंच के संचालक श्री अशोक गाँधी ने साध्वी को मेरे नशामुक्ति अभियान के बारे में जानकारी दी. फिंगेश्वर में एक-डेढ़ घंटा  बिताने तथा बधाइयाँ बटोरने के बाद मैं नवापारा राजिम के कार्यक्रम के लिए रवाना हुआ . रात हो चुकी थी फिर भी सैकड़ों लोग माँ कर्मा मंदिर में इंतजार कर रहे थे ,मंदिर में पूजा अर्चना के पश्चात्  मुझे चांवल से तौला गया. यहाँ बड़ा ही रोचक कार्यक्रम हुआ .मैं मन ही मन सोंच रहा था कि आज दिन भर इतने सरे प्रशंसक मिले सबने मुझे असीम स्नेह दिया. इस प्यार के बदले इन बेचारों को आखिर हम देतें भी क्या हैं ? कार्यक्रम के अंत में मुझे बोलने का आग्रह किया गया तो मुझसे रहा नहीं गया. मैंने कहा ----

गलतियाँ हुई है हजार,
भूल हुई है अपार,
फिर भी मिला है प्यार,
मै कैसे करूँ आभार !

कार्यक्रम से विदा लेकर रात लगभग 1030 बजे रायपुर पहुंचा , जहाँ रेडियो श्रोताओं के अलावा अन्य लोग काफी लंबे समय से इंतजार कर रहे थे . उन्होंने सामूहिक रूप से बधाई दी और विदा हो गए . इस प्रकार 58 वीं वर्ष गांठ यादगार लम्हों के साथ गुज़री. घर लौटकर जब फेसबुक खोला तो असंख्य बधाई सन्देश देखकर मन गदगद हो उठा. सरे सन्देश एक सिटिंग में देख माना संभव नहीं था ,दिन भर के दौरे की थकान भी थी अतः धन्यवाद और आभार लिखकर सो गया.               

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